सोमवार, अगस्त 09, 2010

तो परलोक में जाकर क्या करेगा ?

यहां यदि इस जीवन में । इसी मृत्यु लोक में । इस शरीर में । तुमने नरक रूपी महा व्याधि का पूर्व उपचार नहीं किया । तो परलोक में जाकर रोगी मुक्ति के लिया क्या उपाय करेगा । जहां इसके उपचार के लिये कोई औषधि ही प्राप्त नहीं होती । बुडापा तो बाघिन के समान है । जिसे प्रकार चटके हुये घडे का जल धीरे धीरे बह जाता है । उसी प्रकार तुम्हारी आयु भी निरन्तर घटती ही जा रही है । शरीर में विधमान रोग भयंकर शत्रु के समान कष्ट देते हैं । इसलिये वास्तविक कल्याण इसी में है । कि इन सब व्याधियों से मुक्ति प्राप्त करने का प्रयास किया जाय । जब तक शरीर स्वस्थ है । उसमें किसी प्रकार का दुख नही है । जब तक विपत्तियां सामने नहीं हैं । जब तक शरीर की इन्द्रिया सबल हैं । यानी शरीर की जर्जरता से शिथिल नहीं हुयी हैं । तब तक ही आत्मा के कल्याण का प्रयास किया जा सकता है । तत्व ग्यान की प्राप्ति हेतु प्रयत्न किया जा सकता है । बाद में आग लगने पर कुंआ खोदने पर क्या लाभ होगा ? ये मनुष्य अनेक प्रकार के कार्यों में व्यस्त और उलझा हुआ रहने से तेजी से बीत रहे समय को नही जान पाता । वह दुख सुख तथा आत्मा के हित को भी ठीक से नहीं जानता । जन्म लेने वालों को । मरने वालों को । आपत्ति ग्रस्त लोगों को । रोग से पीडित लोगों को । अत्यन्त दुखी लोगों को देखकर भी मनुष्य ममता मोह लालच लोभ के नशे में ऐसा चूर रहता है । कि जन्म मरण आदि नाना प्रकार के दुख वाले संसार से भी नही डरता और इसमें मगन हो जाता है । यहां की सभी सम्पदा स्वप्न के समान ही तो है । यौवन फ़ूल के समान है । अर्थात शीघ्र कुम्हला जाने वाला है । आयु चंचल बिजली के समान नष्ट हो जाने वाली है । ऐसा जानकर भी धैर्य बना रहना क्या उचित जान पडता है । ये सौ वर्ष का जीवन बहुत छोटा है । जो आधा तो आलस और नींद में ही चला जाता है । कुछ बचपन । रोग और वृद्धावस्था और अन्य दुखों में व्यतीत हो जाता है । युवावस्था का जो थोडा सा महत्वपूर्ण है । वो भोग विलास और अन्य लोभ में खत्म हो जाता है । जो कार्य तुरन्त करना चाहिये । उसके सम्बन्ध में सोच विचार नहीं है । जहां जागते रहना चाहिये । वहां तुम सोते हो । भय के स्थान पर बिना कारण आश्वस्त हो । ऐसा कौन सा मनुष्य है । जो मारा नही जायेगा ? जल के बुलबुले के समान जीव इस शरीर में स्थित है । यहां जिन वस्तुओं का साथ हैं । वे अनित्य हैं । फ़िर भी जीव कैसे निर्भयता से नितान्त अनित्य । शरीर । भोग । पुत्र । स्त्री । कुल आदि के साथ भ्रम में रहता है । कि यही सच है ? क्या ये वास्तव में सच है ? जो अहित में हित । अनिश्चित में निश्चित । अनर्थ में अर्थ को समझता है । ऐसा व्यक्ति अपने मुख्य प्रयोजन से निश्चय ही दूर है । जो पत्थर को देखते हुये भी ठोकर खाता है । जो सुनते हुये भी सत्य ग्यान को प्राप्त नहीं कर पाता । जो सद ग्रन्थों को पडते हुये भी उनके रहस्य को नही समझ पाता । वह निश्चय ही देव माया से विमोहित है और अन्त में दुर्दशा को प्राप्त होने वाला है । इसमें कोई संशय की बात नहीं है । अपने भूल का फ़ल उसे स्वयं ही भोगना होगा । ये तय ही है ?
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
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