सोमवार, अगस्त 09, 2010

मैं मैं चिल्लाते हुये मनुष्य़ को कालरूपी भेडिया मार डालता है ।

कालरूपी इस महासागर में यह सम्पूर्ण जगत डूबता उतराता रहता है । मृत्यु । रोग । बुडापा । जैसे भयंकर जाल में फ़ंसा और जकडा हुआ भी यह मनुष्य सच को जानने की कोशिश नहीं करता । मनुष्य के लिये प्रतिक्षण भय है । समय तेजी से बीत रहा है । कब काल झपट्टा मार दे । किन्तु अग्यानता के वशीभूत यह उसी प्रकार से दिखाई नहीं दे रहा । जैसे जल में पडा हुआ कच्चा घडा गलते हुये दिखाई नहीं देता । एक बार के लिये वायु को बांध सकते हैं । आकाश को बांट सकते हैं ( खन्ड होना ) तरंगों को सूत्र में पिरो सकते हैं । किन्तु आयु का विश्वाश नहीं कर सकते हैं । जिस प्रकार प्रलय अग्नि के प्रभाव से प्रथ्वी दहकती है । सुमेर जैसे पर्वत बिखरने लगते हैं । समुद्र का जल सूख जाता है । फ़िर इस क्षण भंगुर शरीर के सम्बन्ध में क्या कहा जा सकता है ? ये मेरा पुत्र है । ये मेरी पत्नी है । ये मेरा धन है । इस प्रकार बकरे के समान मैं मैं चिल्लाते हुये इस मनुष्य़ को कालरूपी भेडिया जबरदस्ती मार डालता है । यह मैंने किया है । यह मुझे करना है । यह किया गया । यह नही किया गया । इस प्रकार की भावना वाला मनुष्य स्वतः ही मृत्यु के वश में हो जाता है । कल किये जाने वाले कार्य को आज ही कर लो । जो आज करना है अभी कर लो । क्योंकि तुम्हारा कार्य हो गया या अभी अधूरा है । या बिलकुल नही हुआ । मृत्यु कभी इसका विचार नहीं करती । वृद्धावस्था ( मृत्यु को ) राह दिखा रही है । भयंकर रोग इसके सैनिक हैं । मृत्यु इसकी प्रबल शत्रु है । फ़िर भी आदमी इसका भक्ति रूपी रक्षा करने वाला अमोघ हथियार प्राप्त नहीं करता । इससे बडी मूर्खता क्या होगी । तृष्णा रूपी सुई से छेदा हुआ । विषय रूपी घी में डूबा हुआ । राग द्वेश रूपी अग्नि में पके हुये इस मनुष्य रूपी पकवान को मृत्यु बडे चाव से तत्काल ही खा लेती है । बालक । युवा । बूडे । और गर्भ में स्थित सभी प्राणियों को मृत्यु अपने में समाहित कर लेती है । इस जगत का ऐसा ही हाल देखा जाता है । यह जीव अपने शरीर को भी त्यागकर यमलोक चला जाता है । तो भला माता पिता स्त्री पुत्र जो सम्बन्ध हैं । वे किस कारण से बनाये गये हैं । संसार दुख का मूल है । फ़िर वह किसका होकर रहा है । अर्थात जो इस संसार में रम गया । उसने सदा के लिये दुख को पाल लिया । जिसने इस संसार के मोह का त्याग कर दिया । वह सदा के लिये सुखी हो गया । इसके अतिरिक्त दूसरा कोई भी सुखी नही हो सकता । यह संसार सभी दुखों का जनक । समस्त आपदाओं का घर । सब प्रकार के पापों का आश्रय है । अतः ग्यान होते ही मनुष्य को क्षण भर में इसका त्याग कर देना चाहिये । लोहे की जंजीरों में फ़ंसा मनुष्य एक बार को मुक्त हो सकता है । किन्तु स्त्री धन और पुत्र मोह में फ़ंसा व्यक्ति मुक्त नहीं हो पाता । मन को प्रिय लगने वाली जितनी चीजों से मनुष्य सम्बन्ध जोड लेता है । उतनी ही दुख की कीलें उसके ह्रदय में गडती जाती हैं । विषय का आहार करने वाले देह में स्थित देवता । तथा तुम्हारी सभी प्रकार की सामर्थ्य को खत्म कर देने वाले इन्द्रिय रूपी चोरों द्वारा तुम्हारे सभी लोक नष्ट हो रहे हैं । फ़िर भी तुम अग्यान में हो । ये बडे कष्ट की बात है । जिस प्रकार मांस के लोभ में फ़ंसी मछली को अन्दर छुपा कांटा दिखाई नहीं देता । वैसे ही जूठे सुखों के लालच में फ़ंसा हुआ ये मनुष्य यम की फ़ांस को नहीं देख पाता ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
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