गुरुवार, जनवरी 19, 2012

2-4 श्लोक कण्ठस्थ करने मात्र से क्या कोई साधु हो जाता है ?

61 प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! आहार आदि कैसे बनाना चाहिये ?
उत्तर - भोजन शुद्ध विचारधारा से बनाना चाहिये । भोजन बनाने वाले पर काफ़ी कुछ निर्भर करता है । भोजन बनाने वाले को नित्य कर्म करके स्नान, ध्यान करके साफ़ सुथरे वस्त्र धारण कर साफ़ सफ़ाई से भोजन बनाना चाहिये । कहावत है - जैसा खाए अन्न । वैसा होवे मन । भोजन बडी शान्ति से मौन रहकर खुश दिल होकर बनाना चाहिये । भोजन बनाते समय बोलना नहीं चाहिये । क्योंकि वही भोजन आप अपने श्री सदगुरु देव जी महाराज को भोग लगाते हैं । भोजन सदा सात्विक करना कराना चाहिये । मनुष्य का शारीरिक गठन इतना भिन्न है कि सब लोगों के लिये 1 ही नियम नहीं बनाया जा सकता है । मान लीजिये । कोई वस्तु मुझे सहन होती है । परन्तु आपके शरीर को सहन नहीं होती है । मेरा शरीर किसी वस्तु को गृहण कर सकता है । आपका शरीर शायद उसे गृहण न कर सके । इसलिये हम लोगों को अपने शरीर के अनुकूल भोजन का चयन करना चाहिये । हाँ सात्विक भोजन ही खायें खिलायें । साधारण तौर पर यह कहा जा सकता है कि भोजन भारी न हो । ये सावधानी बनाये रखकर । जिसके पेट में जो सहता है । वैसा भोजन किया जा सकता है । भजन में सहायक भोजन करना चाहिये ।
62  प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! मंत्र जागृत किस स्थान पर जल्दी होता है ?

उत्तर - आश्रम में । मन्दिर में । पंचवटी में । नदी के किनारे । सागर के किनारे । शुद्ध पवित्र स्थान पर मंत्र जल्दी जाग्रत होता है । जो लोग ठीक ठीक भजन करते हैं । वे सहज ही कुछ दिन के बाद इसे जान सकते हैं । यह समझना कठिन नहीं है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के प्रति एकनिष्ठ भाव तथा आचरण की शुद्धता से मन्त्र शीघ्र जाग्रत होता है ।
वाराणसी नगरी संसार से अलग है । महा चैतन्यमय स्थान है । यहीं पर गंगा तट के किनारे बैठकर भजन ध्यान करने वाले को 10 गुना अधिक फ़ल मिलता है । यहां छोटे बडे । धनी गरीब जो भी हैं । सभी को साधन भजन का पूर्ण अधिकार है । श्री सदगुरू देव जी महाराज सबको भक्ति । भजन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान । चिन्तन करने का पूर्ण अवसर देते हैं । श्री सदगुरू देव जी महाराज की वाणी है कि यहां पर रहने वाले सभी भक्त 1 दिन मुक्त हो जायेंगे । श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज का दर्शन । पूजा । आरती । भजन । सुमिरन । सेवा । ध्यान । चिन्तन । मनन करने वाले भक्त का मन्त्र जाग्रत तो हो ही जाता है । परन्तु तपो भूमि की अपनी 1 विशेषता है । यहां पर रहकर भजन । सुमिरन । ध्यान । अर्चन । वन्दन । पूजन करने वाले को 10 गुना अधिक लाभ मिलता है । महापुरूषों की वाणी है - गुरूद्वारे में जहां सर कटने वाला हो । वहां खरोंच लगकर रह जाती है ।
तपस्थली का विशेष महत्त्व होता है । शिकार हमेशा जंगल में होता है । देखो । शिकारी हमेशा जंगल में शिकार 


खेलने जाता है । शहर या घर में नहीं । ठीक उसी प्रकार भजन, तपस्या के लिये उचित स्थान आश्रम । तपस्थली । गुरूद्वारा है । कोई बिरला ही लाखों करोडों में गृहस्थी में रहकर मुक्ति पा सकता है । मन्त्र जाग्रत कर सकता है ।
63 प्रश्न - श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज ! क्या मठ बनाना आवश्यक है ?
उत्तर - मठ का निर्माण आवश्यक है । मठ बनाने का प्रथम उद्देश्य जीव कल्याण है । इसलिये जरूरी है । इस संसार में बहुत सारे असहाय । दीन, दुखी । अबला । विधवा । अपंग है । जिनका संसार बहिष्कार करता है । उनका जीवन यापन सबसे सुन्दर तरीकों से मठों में ही होता है । उन्हें आश्रम ही सम्मानित जीवन देता है । मठ में ऐसे दीन दुखियों को दिशा मिलती है । आत्म प्रेरणा मिलती है । जिन्होंने आश्रम का आश्रय लिया । उन्हें संसार सागर से पार जाने का रास्ता श्री सदगुरू देव जी महाराज ही दिखाते हैं । उनकी समस्त बाधाओं को वे दूर कर देते हैं । गुरू वाक्य में विश्वास रखो । जिसने भी गुरू वाणी पर विश्वास कर उनके वचनों का अक्षरश: पालन किया है । जैसा प्रभु कहें । वैसा करते गया है । उनके मन का सारा मैल धुल जाता है । और धीरे धीरे ज्ञान का प्रकाश आने लगता है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के प्रति सच्ची निष्टा । भक्ति भाव । लगन । और पूर्ण विश्वास से ही सब काम बन जाता है । श्री सदगुरू देव जी महाराज को मनुष्य रूप में मत देखो । मत देखना । शिष्य के लिये श्री सदगुरू देव जी महाराज साक्षात परबृह्म भगवान ही है ।


गुरूर्बृह्मा गुरू:विर्ष्णु: गुरूर्देवो महेश्वर: । गुरू: साक्षात परबृह्म तस्मै श्रीगुरवे नम: ।
भगवत बुद्धि से श्री सदगुरू देव जी महाराज का ध्यान । दर्शन । पूजा । सेवा । भजन । आरती करते करते शरीर और मन जब शुद्ध हो जाते हैं । तब गुरू शिष्य को अपने दिव्य स्वरूप का दिव्य दर्शन देकर कृतार्थ कर देते हैं । शुद्ध आधार । शुद्ध मन । और श्री सदगुरू देव जी महाराज के प्रति शुद्ध भाव होने पर ही प्रभु के दर्शन होते हैं । संसार में अनेकों मठ है । जन कल्याण के लिये ही खुले हैं । इनसे जन कल्याण भारी संख्या में हो भी रहा है ।
सतयुग में ध्यान करने से । त्रेता में यज्ञ करने से । द्वापर में पूजा करने से । जो फ़ल प्राप्त होता है । वह फ़ल कलियुग में केवल श्री सदगुरू देव जी महाराज के नाम का जप करने से साधक प्राप्त कर लेता है । परन्तु ऐसा कोई बिरला ही कर पाता है । रात दिन भजन । सुमिरन हो तो क्या बात है । परन्तु होता नहीं । इसलिये मठ बनाने की आवश्यकता है ।
श्री स्वामी जी ने एक दिन कहा था - देखो कलि में सिर्फ़ नाम भजन से ही सब कुछ मिल सकता है । सैकडों करोडों अश्वमेघ यज्ञों से जो पुण्य फ़ल प्राप्त होता है । वह सम्पूर्ण फ़ल सिर्फ़ नाम भजन से ही मिल जाता है । लेकिन नाम भजन रात दिन नहीं हो पाता है । न कोई कर सकता है । रात दिन भजन सुमिरन हो सके । तो क्या पूछना । पर होता नहीं है । इसीलिये सेवा कार्य शुरू किया गया है । सेवा कार्य से खूब शक्ति आती है । और भक्ति मिलती है । निष्काम कर्म करने से

भगवान मिलते हैं । गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है -
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय: । असक्तो ह्याचरन कर्म परमाप्रोति पूरूष: ।
हिमालय में जाकर तपस्या किया । गेरूआ वस्त्र धारण कर लिया । घूम फ़िर कर । भिक्षा मांग कर भोजन कर लिया । और 2-4 श्लोक कण्ठस्थ करने मात्र से क्या कोई साधु हो जाता है ? साधु होने के लिये आध्यात्मिक प्रगति होनी चाहिये । आध्यात्मिक प्रगति एकमात्र श्री सदगुरू देव जी महाराज के द्वारा ही हो सकती है । श्री सदगुरू देव जी महाराज जीवों से दर्शन । पूजा । सेवा । भजन । सुमिरन । ध्यान । आरती करवा कर उन्हें रूहानी मंजिल तक पहुंचा देते हैं ।
यदि स्कूल नहीं रहेगा । तो कहाँ पर विधार्थी अध्ययन करेंगे ? अब कोई कहे कि क्या विधा अध्ययन जरूरी है । हाँ जरूरी है । जरूरी ही नहीं अनिवार्य है । कारण कि विधालय नहीं रहेगा । शिक्षा कहाँ से ग्रहण करेगा । विधा अध्ययन कैसे करेगा ? इसलिये मठ अनिवार्य हैं । मठ नहीं रहेगा । तो भजन करने वाले साधकों के लिये भजन की शिक्षा । दीक्षा । भजन की विधि कौन बतायेगा ? सेवा भाव कहां से आयेगा । बृह्मविधा कौन बतायेगा ? इसलिये मठ बनाना जरूरी है । जरूरी ही नहीं । अनिवार्य है ।
64 प्रश्न - 1 भक्त ने 1 सन्त की शरण में जाकर प्रार्थना करते हुए पूछा - प्रभु ! सदगुरू नाम में प्रेम हो । और उनमें चित्त कैसे लगे ? इसकी कोई युक्ति बताइये ।

उत्तर - सन्त ने फ़रमाया कि श्री सदगुरू भगवान के नाम का मूल्य एवं महत्त्व जब समझ में आ जाता है । तभी उसमें प्रेम होता है । और तभी भजन, सुमिरन में मन व चित्त लगता है ।
फ़िर भक्त ने कहा - महाराज ! मूल्य और महत्व तो कुछ कुछ समझ में आता है । परन्तु उसमें चित्त नहीं लगता ।
उत्तर - तुमको कुछ समझ में नहीं आया । यदि समझ में आ गया होता । तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि नाम के भजन सुमिरन में मन न लगे । फ़िर भक्त कहता है कि - नहीं महाराज ! ऐसा तो कदापि नहीं है ।
अब सन्त ने प्रश्न किया - अच्छा बताओ । तुम्हारी मासिक आय क्या है ? भक्त ने उत्तर दिया - लगभग 15000 रूपये ।
सन्त ने फ़रमाया कि अब विचार करो । और हिसाब लगाओ । इसका अर्थ है । 500 रूपया प्रतिदिन । अर्थात रात दिन मिलाकर 24 घण्टे में 500 रूपये । तो 1 घण्टे में लगभग 21 रूपये । और 1 मिनट में लगभग 35 पैसे । 1 मिनट में तुम 35 बार तो सदगुरू भगवान के नाम का स्मरण आसानी से कर सकते हो । अर्थात जितनी देर में तुम 1 पैसा कमाते हो । उतनी देर में 1 बार प्रभु के नाम का सुमिरन तो हो सकता है । इतने पर भी तुम पैसे के लिये तो हर पल चेष्टा करते हो । परन्तु नाम के भजन, सुमिरन के लिये नहीं । अब तुम बताओ कि क्या तुमने नाम भजन, सुमिरन का मूल्य एवं महत्त्व पैसे से भी कम नहीं समझा ?
बात भक्त की समझ में आ गई । उस दिन वह सांसारिक काम काज करने के साथ नियम पूर्वक नाम का भजन,

सुमिरन करने लगा ।
65 प्रश्न - भक्त कहता है कि मेरा मन भजन, ध्यान में नहीं लगता है । इसका उपाय बताइये ।
उत्तर - अपने श्री सदगुरू देव महाराज के प्रति पूर्ण श्रद्धा व प्रेम रखने से । उनके उपदेश को सुनने से । दरबार में बैठकर साधना करने से । मन शान्त होता है । और कृमश: भजन । सुमिरन । ध्यान में मन लगने लगता है । अर्थात जो अभ्यास साधक को करने को बताया गया है । यदि उसको दरबार में बैठकर करे । तब तो मन लगने लगता है । उसी अभ्यास को चहल पहल वाली जगह में बैठकर करने से । न मन भजन में लगता है । और न ध्यान ही । मन के अन्दर जमता है । पहले पहल अभ्यास के प्रारम्भ में अभ्यासियों को अभ्यास में रस तथा आनन्द कम होता है ।
66  प्रश्न - एक अभ्यासी ने पूछा - मन में यह इच्छा बार बार उठती है कि आन्तरिक चक्रों का जो हाल सन्तों के द्वारा सुना है । उनमें से पहला चक्र भजन ध्यान करते करते कुछ दिन के ही अभ्यास से खुल जाय । तो गुरू में और उनकी बतलाई हुई साधना में प्रेम और प्रतीत बढे । क्या ऐसा हो सकता है ?
उत्तर - प्रथम तो यह अभ्यास बहुत कठिन है । परन्तु यदि श्री सदगुरू देव महाराज की कृपा हो गई । तो यह चक्र खुल सकता है । खुलने के बाद साधक अन्दर में अपनी जगह बनाकर । कुछ दिन भजन सुमिरन का अभ्यास करेगा । और फ़िर वह चाहेगा कि हमारी साधना यानी भजन ध्यान की क्रिया सुचारू रूप से चले । और भजन, ध्यान में दिन प्रतिदिन प्रगाढता 


बढती चली जाय । तथा मालिक के श्री  चरणों में प्रीति बढती जाय । इस तरह वह भजन ध्यान में मन निरन्तर लगाये रहता है । इसी प्रकार से यदि श्री सदगुरू की कृपा से अन्दर में श्री सदगुरू देव जी महाराज का दर्शन बराबर मिलता रहा । तो दर्शन को बराबर करते रहना चाहिये । यह साधक के साधना की पहली कडी है । साधकों, शिष्यों को यह मालूम होना चाहिये कि आन्तरिक चक्रों की झलक दिखाई देना । व अन्दर में पहुंचकर भजन सुमिरन ध्यान की प्रक्रिया जारी करना । कोई साधारण बात नहीं है । फ़िर भी अभ्यास के साथ साथ जब तक सदाचार में पूर्णता न आ जाय । तब तक स्थिरता आना बहुत कठिन है । इसलिये श्री सदगुरू देव महाराज के आगे गिर कर त्राहिमाम त्राहिमाम करते हुए उनसे विनती करें कि मुझ पर दया करें । मुझ जैसे दीनहीन पर कृपा कर । भजन । सुमिरन । ध्यान मन में जमाकर इन चक्रों से आगे बढाने की कृपा करें । ऐसी विनती करते रहने से दया जरूर होती है ।
गुरू की मूरत बसी हिये में । आठ पहर संग रहाये । अस गुरू भक्ति करी जिन पूरी । तिन तिन नाम समाये । स्वाती बूंद जस रटत पपीहा । अस धुन नाम समाये । नाम प्रताप सुरत जब जागी । तब सुरत ऊपर चढ धाये ।
जब साधक नाम का सुमिरन, भजन और ध्यान करेगा । तब गुरू की दया वाली प्रीत जागेगी । तभी सुरत ऊपर की ओर प्रगतिशील होगी । भक्तजन को चाहिये कि नाम को श्वासों के द्वारा पकड कर निरन्तर नाम का भजन, सुमिरन करते रहें । जब नाम का भजन, सुमिरन पक्का हो जायेगा । तब ध्यान भी अच्छी तरह से आने लग जायेगा । इसीलिये श्री सदगुरू स्वरूप का 


ध्यान करने और साथ ही साथ नाम जपने से दोनों का साथ सध जाता है । कहा गया है - सदगुरू शब्द स्वरूप हैं ।
भजन, सुमिरन और ध्यान करने में जो तरीका अपनाया जाता है । उसी को पूरा नहीं समझना चाहिये । बल्कि और भी ज्यादा से ज्यादा तजुर्बा हासिल करने की कोशिश करनी चाहिये । जैसे सत शास्त्रों को सुनना पढना । यानी पुस्तकीय जानकारी के साथ श्री सदगुरू देव जी महाराज से तरह तरह के तरीके की जानकारी करते रहना चाहिये । जिस प्रकार अभ्यास बढता जायेगा । नया नया तजुर्बा होता जायेगा ।
यदि नियमित रूप से भजन, सुमिरन, ध्यान किया जाय । जो धीरे धीरे ऐसा लगने लगेगा कि सदगुरू का स्वरूप धीरे धीरे नजदीक यानी हमारे अन्दर आता जा रहा है । सबसे आवश्यक बात यह है कि श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री चरणों में प्रीति और प्रतीत के साथ अभ्यास करता रहे । श्री स्वामी जी महाराज समझाते थे कि अभ्यास से अभिप्राय यह है कि - आत्म और मन जिनकी ग्रन्थि इस स्थूल यानी पिण्ड शरीर में बंधी हुई है । वह खुलने लगे । आत्मा मन के फ़न्दे से न्यारी हो । और उसकी चाल बृह्माण्ड की ओर हो । तथा चढाई करके सन्तों के देश दयालदेश तक पहुंचे ।
अभ्यास करते समय यानी भजन, सुमिरन व ध्यान करते समय मन को नाम के सुमिरन में एकाग्र करते करते मालिक यानी श्री सदगुरू देव जी महाराज के ही ध्यान में मन को स्थिर करना चाहिये । यदि कुछ देर बाद ख्याल या सुरति कहीं अन्यत्र चली जाय । तो भी उसको खींचकर श्री सदगुरू 


देव के भजन ध्यान में बार बार लगाते रहना चाहिये । ऐसा करने से कृमश: धीरे धीरे मन भजन व ध्यान में लगने लग जायेगा । इसके बाद भी मन न लगे । तो श्री सदगुरू देव महाराज की आरती । वन्दना । गुरू चालीसा थोङा जोर जोर से भाव विभोर होकर गाना चाहिये । ऐसा करने से मन मालिक में लग जायेगा । ऐसा ख्याल रखना चाहिये  कि मन हर वक्त श्री सदगुरू भगवान के प्रेम के रंग में रंगा रहे । प्रभु के ख्याल में डूबा रहे । ऐसा अभ्यास करते हुए मालिक के भजन, ध्यान में मन को सदा लगाते रहना चाहिये । सदा मन के बराबर प्रवाह को संसारी मोह माया की ओर से मोडकर मालिक में बराबर लगाते रहना चाहिये । यानी ख्याल को अन्तर्मुखी बनाये रखना चाहिये । ऐसा करते करते साधक अन्दर में ऊपर की ओर चढाई करने लगते हैं । इस प्रकार का प्रयोग करने से अभ्यास में आनन्द भी आता है । और मन भी लगने लग जाता हैं ।
अभ्यास करते समय भजन, ध्यान में अभ्यासी अपने मन और सुरत को सहसदल कमल पर जमावे । और कुछ देर के लिये अपनी सुरत को भजन, ध्यान या मानसिक पूजा में लगाये रखे । ऐसा करने से मन माया की तरफ़ से मुड जायेगा । और ऊपर की ओर जो चढाई है । उसका रस उसको अवश्य मिलने लग जायेगा । इसी तरह अभ्यास करते करते जब मन भजन, ध्यान में लग जायेगा । तो साधक धीरे धीरे भजन, सुमिरन, ध्यान के आनन्द में विभोर होता हुआ । आकर्षण में खिंचा हुआ । उस स्थान तक पहुंच जायेगा । जहां मालिक का स्थान है ।
******************
- ये शिष्य जिज्ञासा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।
2-4 श्लोक कण्ठस्थ करने मात्र से क्या कोई साधु हो जाता है ?
एक टिप्पणी भेजें

Welcome

मेरी फ़ोटो
Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

Follow by Email