शनिवार, अगस्त 13, 2011

अधर्म फैल जाने पर कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 1

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय । 1-1
धृतराष्ट्र बोले - हे संजय ! धर्मक्षेत्र में । युद्ध की इच्छा से । इकठ्ठे हुये । मेरे और । पाण्डव के पुत्रों ने । क्या किया ?

दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमबृवीत । 1-2
संजय बोले -  हे राजन ! पाण्डवों की सेना व्यवस्था देखकर । दुर्योधन ने । अपने आचार्य के पास । जाकर । उनसे कहा ।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता । 1-3
हे आचार्य ! आपके तेजस्वी शिष्य । द्रुपद पुत्र द्वारा । व्यवस्थित की । इस विशाल पाण्डु सेना को । देखिये ।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः । 1-4
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः । 1-5
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः । 1-6
इसमें भीम और अर्जुन के ही समान । बहुत से महान । शूरवीर योद्धा हैं । जैसे युयुधान । विराट और महारथी द्रुपद । धृष्टकेतु । चेकितान । बलवान काशिराज । पुरुजित । कुन्तिभोज । तथा नरश्रेष्ट शैब्य । विक्रान्त । युधामन्यु । वीर्यवान उत्तमौजा । सुभद्रापुत्र ( अभिमन्यु ) और द्रोपदी के पुत्र सभी महारथी हैं ।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्बृवीमि ते । 1-7
हे द्विजोत्तम ! हमारी ओर भी । जो विशिष्ट योद्धा हैं । उन्हें आपको बताता हूँ । हमारी सैन्य के जो प्रमुख नायक हैं । उनके नाम । मैं आपको बताता हूँ ।
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च । 1-8
आप स्वयँ । भीष्म पितामह । कर्ण । कृप । अश्वत्थामा । विकर्ण । तथा सौमदत्त ( सोमदत्त के पुत्र )  यह सभी प्रमुख योद्धा हैं ।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः । 1-9
हमारे पक्ष में युद्ध में कुशल । तरह तरह के शस्त्रों में माहिर । और भी अनेकों योद्धा हैं । जो मेरे लिये अपना जीवन तक त्यागने को तैयार हैं ।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम  । 1-10
भीष्म पितामह द्वारा रक्षित । हमारी सेना का बल पर्याप्त नहीं है । परन्तु भीम द्वारा रक्षित । पाण्डवों की सेना । बल पूर्ण है ।
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि  । 1-11
इसलिये सब लोग । जिन जिन स्थानों पर नियुक्त हों । वहां से सभी । हर ओर से । भीष्म पितामह की । रक्षा करें ।
तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शङखं दध्मौ प्रतापवान । 1-12
तब कुरुवृद्ध । प्रतापवान । भीष्म पितामह ने । दुर्योधन के हृदय में । हर्ष उत्पन्न करते हुये । उच्च स्वर में । सिंहनाद किया । और शंख बजाना आरम्भ किया ।
ततः शङखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत । 1-13
तब अनेक शंख । नगारे । ढोल । शृंगी आदि बजने लगे । जिनसे घोर नाद उत्पन्न हुआ ।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङखौ प्रदध्मतुः । 1-14
तब श्वेत अश्वों से वहित । भव्य रथ में विराजमान । भगवान माधव । और पाण्डव पुत्र अर्जुन ने भी । अपने अपने शंख बजाये ।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः । पौण्ड्रं दध्मौ महाशङखं भीमकर्मा वृकोदरः  । 1-15
भगवान हृषिकेश ने पांचजंय नामक अपना शंख बजाया । और धनंजय ( अर्जुन ) ने देवदत्त नामक शंख बजाया । तथा भीम कर्मा भीम ने । अपना पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया ।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ । 1-16
कुन्ती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने । अपना अनन्त विजय नामक शंख । नकुल ने सुघोष । और सहदेव ने अपना मणि पुष्पक । नामक शंख बजाये ।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः । 1-17
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथ्वीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक  । 1-18
धनुर्धर काशिराज । महारथी शिखण्डी । धृष्टद्युम्न । विराट तथा अजेय सात्यकि । द्रुपद । द्रोपदी के पुत्र । तथा अन्य सभी राजाओं ने । तथा महाबाहु सौभद्र ( अभिमन्यु ) ने  सभी ने । अपने अपने शंख बजाये ।
स घोषो धर्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत । नभश्च पृथ्वीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन  । 1-19
शंखों की उस महाध्वनि से । आकाश और पृथ्वी गूँजने लगी । तथा धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय भिन्न गये ।
अथ व्यवस्थितान्दृष्टवा धृर्तराष्ट्रान्कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः । 1-20

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत । 1-21
यावदेतान्निरिक्षेऽहं योद्धकामानवस्थितान । कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे । 1-22
तब धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यवस्थित देख । कपिध्वज ( जिनके ध्वज पर हनुमान विराजमान थे ) अर्जुन ने शस्त्र उठाकर । भगवान हृषिकेश से । यह वाक्य कहे ।
अर्जुन बोले -  हे अच्युत ! मेरा रथ । दोनों सेनाओं के मध्य में । स्थापित कर दीजिये । ताकि मैं । युद्ध की इच्छा रखने वाले । इन योद्धाओं का निरीक्षण कर सकूँ । जिनके साथ मुझे युद्ध करना है ।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । धृर्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः । 1-23
दुर्बुद्धि दुर्योधन का । युद्ध में प्रिय चाहने वाले राजाओं को । जो यहाँ युद्ध के लिये एकत्रित हुये हैं । मैं देख लूँ ।

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम । 1-24
संजय बोले - हे भारत ! ( धृतराष्ट्र )  गुडाकेश के इन वचनों पर । भगवान हृषिकेश ( श्रीकृष्ण ) ने । उस उत्तम रथ को । दोनों सेनाओं के मध्य में । स्थापित कर दिया ।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम । उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति  । 1-25
रथ को भीष्म पितामह । द्रोण । तथा अन्य सभी प्रमुख राजाओं के सामने ( उन दोनों सेनाओं के बीच में ) स्थापित कर । श्रीकृष्ण  ने अर्जुन से कहा कि -  हे पार्थ ! इन कुरुवंशी राजाओं को देखो ।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान । आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा । 1-26
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान  । 1-27
वहाँ पार्थ ने उस सेना में । अपने पिता के भाईयों । पितामहों ( दादा ) आचार्यों । मामों । भाईयों । पुत्रों । मित्रों । पौत्रों । स्वसुरों ( ससुर ) संबन्धियों को । दोनों तरफ की सेनाओं में देखा ।

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत । दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम । 1-28
इस प्रकार । अपने सगे संबन्धियों । और मित्रों को । युद्ध में उपस्थित देख । अर्जुन का मन । करुणा पूर्ण हो उठा । और उसने विषाद पूर्वक । कृष्ण से यह कहा - हे कृष्ण ! मैं अपने लोगों को । युद्ध के लिये तत्पर । यहाँ खडा देख रहा हूँ ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते । 1-29
इन्हें देखकर । मेरे अंग । ठण्डे पड रहे है । और मेरा मुख । सूख रहा है । और मेरा शरीर । काँपने लगा है ।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भृमतीव च मे मनः । 1-30
मेरे हाथ से । गाण्डीव धनुष । गिरने को है । और मेरी सारी त्वचा । मानों आग में । जल उठी है । मैं अवस्थित रहने में । अशक्त हो गया हूँ । मेरा मन । भृमित हो रहा है ।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे  । 1-31
हे केशव ! जो निमित्त है । उसमें भी मुझे । विपरीत ही दिखाई दे रहे हैं । क्योंकि हे केशव ! मुझे अपने ही । स्वजनों को । मारने में । किसी भी प्रकार का । कल्याण दिखाई नहीं देता ।
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगेर्जीवितेन वा । 1-32
हे कृष्ण ! मुझे विजय । या राज्य । और सुखों की । इच्छा नहीं है । हे गोविंद ! ( अपने प्रियजनों की हत्या कर ) हमें राज्य से । या भोगों से ।  यहाँ तक कि जीवन से भी । क्या लाभ है ?
येषामर्थे काङिक्षतं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च । 1-33
जिनके लिये ही हम । राज्य । भोग । तथा सुख । और धन की । कामना करें । वे ही । इस युद्ध में । अपने प्राणों की बलि । चढने को तैयार । यहाँ अवस्थित हैं ।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः स्वसुराः पौत्राः श्यालाः संबन्धिनस्तथा । 1-34
गुरुजन । पिता जन । पुत्र । तथा पितामह । मातुल ।  ससुर । पौत्र । साले । आदि सभी सम्बन्धी । यहाँ प्रस्तुत हैं ।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते । 1-35
हे मधुसूदन ! इन्हें हम । त्रैलोक्य के राज के लिये भी । नहीं मारना चाहेंगें । फिर इस धरती के लिये । तो बात ही क्या है । चाहे ये हमें । मार भी दें ।
निहत्य धृर्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः । 1-36
धृतराष्ट्र के इन पुत्रों को मारकर । हमें भला क्या । प्रसन्नता प्राप्त होगी । हे जनार्दन ! इन आततायियों को मार कर । हमें पाप ही प्राप्त होगा ।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धृर्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान । स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव । 1-37
इसलिये धृतराष्ट्र के पुत्रों । तथा अपने अन्य संबन्धियों को मारना । हमारे लिये उचित नहीं है । हे माधव ! अपने ही स्वजनों को मारकर । हमें किस प्रकार । सुख प्राप्त हो सकता है ?
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम । 1-38
यद्यपि ये लोग । लोभ के कारण । जिनकी बुद्धि । हरी जा चुकी है । अपने कुल के ही । क्षय में । और अपने मित्रों के साथ । द्रोह करने में । कोई दोष नहीं । देख पा रहे ।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यदभर्जनार्दन । 1-39
परन्तु हे जनार्दन ! हम लोग तो । कुल का क्षय करने में । दोष देख सकते हैं । हमें इस पाप से । निवृत्त क्यों नहीं । होना चाहिये ( अर्थात इस पाप करने से टलना चाहिये )
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत । 1-40
कुल के क्षय हो जाने पर । कुल के सनातन ( सदियों से चल रहे ) कुलधर्म भी नष्ट हो जाते हैं । और कुल के धर्म नष्ट हो जाने पर । सभी प्रकार के अधर्म बढने लगते हैं ।
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः । 1-41
अधर्म फैल जाने पर । हे कृष्ण ! कुल की स्त्रियाँ भी । दूषित हो जाती हैं । और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर । वर्ण धर्म नष्ट हो जाता है ।
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः । 1-42
कुल के कुलघाती वर्णसंकर ( वर्ण धर्म के न पालन से ) नरक में गिरते हैं । इनके पितृजन भी । पिण्ड और जल की परम्पराओं के नष्ट हो जाने से ( श्राद्ध आदि का पालन न करने से ) अधोगति को । प्राप्त होते हैं ( उनका उद्धार नहीं होता ) ।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः । 1-43
इस प्रकार वर्ण भृष्ट । कुलघातियों के दोषों से । उनके सनातन कुल । धर्म और जाति धर्म । नष्ट हो जाते हैं ।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम । 1-44
हे जनार्दन ! कुलधर्म भृष्ट हुये मनुष्यों को । अनिश्चित समय तक । नरक में वास करना पडता है । ऐसा हमने सुना है ।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः । 1-45
अहो ! हम इस महापाप को । करने के लिये । आतुर हो । यहाँ खडे हैं । राज्य और सुख के लोभ में । अपने ही स्वजनों को । मारने के लिये । व्याकुल हैं ।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धृर्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत । 1-46
यदि मेरे विरोध रहित रहते हुये । शस्त्र उठाये बिना भी । यह धृतराष्ट्र के पुत्र । हाथों में शस्त्र पकङे । मुझे इस युद्ध भूमि में । मार डालें । तो वह मेरे लिये ( युद्ध करने की जगह ) ज्यादा अच्छा होगा ।

एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः । 1-47
संजय बोला - यह कहकर । शोक से उद्विग्न हुये । मन से । अर्जुन अपने धनुष बाण छोडकर । रथ के पिछले भाग में बैठ गये ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...