शनिवार, अगस्त 13, 2011

मोहित हुआ यह संसार मुझ अविनाशी परम आत्मा को नहीं जानता - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 7

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु । 7-1
श्रीकृष्ण बोले - मुझमें लगे मन से । हे पार्थ ! मेरा आश्रय लेकर । योगाभ्यास करते हुये । तुम बिना शक के । मुझे पूरी तरह । कैसे जान जाओगे ? वह सुनो ।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते । 7-2
मैं तुम्हें । ज्ञान और अनुभव के । बारे में । सब बताता हूँ । जिसे जान लेने के बाद । और कुछ भी जानने वाला बाकी नहीं रहता ।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः । 7-3
हजारों मनुष्यों में । कोई ही । सिद्ध होने के लिये । प्रयत्न करता है । और सिद्धि के लिये । प्रयत्न करने वालों में भी । कोई ही । मुझे । सार तक जानता है ।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा । 7-4
भूमि । जल । अग्नि । वायु । आकाश । मन । बुद्धि । और अहंकार – यह भिन्न भिन्न 8 रूपों वाली मेरी प्रकृति है ।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत । 7-5
यह नीचे है । इससे अलग । मेरी 1 और प्रकृति है । जो परम है । जो जीवात्मा का रूप लेकर । हे महाबाहो ! इस जगत को धारण करती है ।
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा । 7-6
यह 2 ही । वह योनि हैं । जिससे सभी जीव संभव होते हैं । मैं ही । इस संपूर्ण जगत का । आरम्भ हूँ । औऱ अन्त भी ।
मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । 7-7
मुझे छोड़कर । हे धनंजय ! और कुछ भी । नहीं है । यह सब मुझसे । वैसे ही पूरा ( पिरोया ) हुआ है । जैसे मणियों में धागा । पूरा होता है ।
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु । 7-8
मैं पानी का । रस हूँ । हे कौन्तेय ! चन्द्र और सूर्य की । रोशनी हूँ । सभी वेदों में वर्णित - ॐ हूँ । और पुरुषों का पौरुष हूँ ।
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु । 7-9
पृथ्वी की । पु्ण्य सुगन्ध हूँ । और अग्नि का - तेज हूँ । सभी जीवों का - जीवन हूँ । और तप करने वालों का - तप हूँ ।
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम । 7-10
हे पार्थ ! मुझे तुम । सभी जीवों का । सनातन बीज जानो । बुद्धिमानों की - बुद्धि मैं हूँ । और तेजस्वियों का - तेज मैं हूँ ।
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ । 7-11
बलवानों का वह बल । जो काम और राग मुक्त हो । वह मैं हूँ । प्राणियों में वह इच्छा । जो धर्म विरुद्ध न हो । वह मैं हूँ । हे भारत श्रेष्ठ !
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि । 7-12
जो भी । सत । रज । अथवा तम गुण से होता है । उसे तुम । मुझसे ही हुआ जानो । लेकिन मैं उनमें नहीं । वे मुझमें हैं ।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम । 7-13
इन 3 गुणों के भाव से । यह सारा जगत मोहित हुआ । मुझ अव्यय और परम को नहीं जानता ।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते । 7-14
गुणों का रूप धारण की । मेरी इस दिव्य माया को । पार करना । अत्यन्त कठिन है । लेकिन । जो मेरी ही । शरण में आते हैं । वे इस माया को । पार कर जाते हैं ।
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः । 7-15
बुरे कर्म करने वाले । मूर्ख । नीच लोग । मेरी शरण में नहीं आते । ऐसे दुष्कृत लोग । माया द्वारा । जिनका ज्ञान । छिन चुका है । वे असुर भाव का आश्रय लेते हैं ।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ । 7-16
हे अर्जुन ! 4 प्रकार के । सुकृत लोग । मुझे भजते हैं । 1 मुसीबत में जो हैं । 2 जिज्ञासु । 3 धन आदि के इच्छुक । और जो 4 ज्ञानी हैं । हे भरतर्षभ ।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः । 7-17
उनमें से । ज्ञानी ही । सदा । अनन्य भक्ति भाव से । युक्त होकर । मुझे भजता हुआ । सबसे उत्तम है । ज्ञानी को । मैं बहुत प्रिय हूँ । और वह भी । मुझे वैसे ही प्रिय है ।
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम ।  आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम । 7-18
यह सब ही उदार हैं । लेकिन मेरे मत में । ज्ञानी तो । मेरा अपना । आत्म ही है । क्योंकि - मेरी भक्ति भाव से युक्त । और मुझमें ही । स्थित रहकर । वह सबसे उत्तम गति ।  मुझे प्राप्त करता है ।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः । 7-19
बहुत जन्मों के अन्त में । ज्ञानमंद । मेरी शरण में । आता है । वासुदेव ही । सब कुछ हैं । इसी भाव में । स्थिर महात्मा । मिल पाना । अत्यन्त कठिन है ।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया । 7-20
इच्छाओं के कारण । जिनका ज्ञान । छिन गया है । वे अपने अपने । स्वभाव के अनुसार । नियमों का पालन करते हु्ये । अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं ।
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम । 7-21
जो भी मनुष्य । जिस जिस देवता की । भक्ति और श्रद्धा से । अर्चना करने की । इच्छा करता है । उसी रूप ( देवता ) में । मैं उसे । अचल श्रद्धा । प्रदान करता हूँ ।
 स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान । 7-22
उस देवता के लिये ( मेरी ही दी ) श्रद्धा से युक्त होकर । वह उसकी । आराधना करता है । और अपनी । इच्छा पूर्ति प्राप्त करता है । जो मेरे द्वारा ही । निर्धारित की गयी होती है ।
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम  । देवान्देवय जो यान्ति मदभक्ता यान्ति मामपि । 7-23
अल्प बुद्धि वाले । लोगों को । इस प्रकार प्राप्त हुये । यह फल । अन्तशील हैं । देवताओं का । यजन करने वाले । देवताओं के पास जाते हैं । लेकिन । मेरा भक्त । मुझे ही प्राप्त करता है ।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम । 7-24
मुझ अव्यक्त ( अदृश्य ) को । यह अवतार लेने पर । बुद्धिहीन लोग । देहधारी मानते हैं । ( और ) मेरे परम भाव को । अर्थात मुझे । नहीं जानते । जो कि अव्यय ( विकार हीन ) और परम उत्तम है ।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम । 7-25
अपनी योग माया से । ढका मैं । सबको नहीं दिखता हूँ । इस संसार में । मूर्ख । मुझ अजन्मा । और विकार हीन को । नहीं जानते ।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन । 7-26
हे अर्जुन ! जो बीत चुके हैं । ( और ) जो वर्तमान में हैं । और जो भविष्य में होंगे । उन सभी जीवों को । मैं जानता हूँ । लेकिन मुझे कोई नहीं जानता ।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप । 7-27
हे भारत ! इच्छा और द्वेष से उठी । द्वन्द्वता से मोहित होकर । सभी जीव । जन्म चक्र में फसे रहते हैं । हे परन्तप !
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृणवृताः । 7-28
लेकिन । जिनके पापों का । अन्त हो गया है । वह । पुण्य कर्म करने वाले । लोग । द्वन्द्वता से निर्मुक्त होकर । दृण वृत से । मुझे भजते हैं ।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते बृह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम । 7-29
बुढापे और मृत्यु से । छुटकारा पाने के लिये । जो मेरा । आश्रय लेते हैं । वे । उस बृह्म को । सारे अध्यात्म को । और संपूर्ण कर्म को । जानते हैं ।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः । 7-30
वे । सभी भूतों में । दैव में । और यज्ञ में । मुझे जानते हैं । मृत्युकाल में भी । इसी बुद्धि से युक्त । चित्त से । वे मुझे ही जानते हैं ।

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