मंगलवार, अगस्त 17, 2010

मन को देखना ...?


मन । काल । कल्पना । सृष्टि । इन चारों शब्दों का अर्थ एक ही है । मन यानी जो माना जा रहा है । या जिससे माना जा रहा है । काल । क्योंकि मन से की गयी कल्पना या विचार मात्र काल्पनिक ही है इसलिये पानी के बुलबुले के समान उसका विचार के अनुसार अस्तित्व है । अब इसमें दूसरे घटक के अनुसार बुलबुले की आयु बड जाती है । जैसे । साफ़ पानी का बुलबुला है । तो कुछ ही सेकेंड रहेगा । साबुन के पानी का बुलबुला है तो साबुन के रूप में दूसरा घटक होने से बुलबुले की आयु पानी के बुलबुले की अपेक्षा बड जायेगी । यदि पानी में तेल का अंश मिला हुआ है । तो बुलबुला और देर तक रहेगा । कीचडयुक्त गन्दगी में बनने वाले बुलबुले और अधिक देर तक रहते हैं । इसी तरह हमारे विचार उनमें मिले भाव और घटक के अनुसार घने या क्षीण होते हैं । और यही आने वाली स्थिति परिस्थिति और यहां तक कि जन्म मरण को भी नियन्त्रित करते हैं । वास्तव में इनको सूक्ष्म रूप में जान लिया जाय । तो यही यम होते हैं । ईश्वर की सृष्टि और इंसान की सृष्टि ( यानी घर मकान शादी आदि अन्य उपक्रम ) लगभग एक ही नियम के अनुसार बनती है । फ़र्क सिर्फ़ इतना है । कि ईश्वर का दस्तावेज आरीजनल होता है । और मनुष्य़ का फ़ोटोस्टेट जैसा । वह संकल्प से बनती है । यह स्थूल क्रिया से । मन से जुडने पर ही आत्मा जीव भाव धारण कर जीवात्मा कहलाने लगता है । और मन से पार हो जाने पर या अमन हो जाने पर यह अविनाशी और जन्म मरण धर्म से मुक्त हो जाता है । काल काल सब कोय कहे । काल न जाने कोय । जो जो मन की कल्पना काल कहावे सोय । मन को योग स्थिति या त्राटक के अच्छे अभ्यास से आराम से देखा जा सकता है । और मजे की बात यह है । कि चित्तवृतियों की तरह इसको उसी तरह शरीर से बाहर देखा जा सकता है । जैसा अभी आप मेरा लेख देख रहे हैं । या किसी भी अन्य चीज को देखते हैं । मन की शेप डेढ सेमी व्यास की गोल बिन्दी के बराबर होती है । और चित्र के अनुसार इसमें अलग अलग अवस्थाओं में परिवर्तन होते हैं । साधारण जीव अवस्था होने पर इस बिन्दी में चार छिद्र होते हैं । जिन्हें मन । बुद्धि । चित्त । अहम । कहते हैं । इन्हीं से संसार बना है । और इन्हीं से संसार आपको नजर आ रहा है । वरना इसकी हकीकत कुछ और ही है ? क्योंकि संसार इन्हीं चारों से बना है । इसलिये इन्ही से बरताव में आता है । इन चारों छिद्रों के पास पानी में उठने वाले बेहद छोटे बुलबुलों के समान स्फ़ुरणा होती रहती है । इसी क्रिया से अनेकों भाव बनते और नष्ट होते रहते हैं । योग अवस्था में यह स्फ़ुरणा शान्त हो जाती है । योग में और अधिक अच्छी स्थिति हो जाने पर ये चारों छिद्र एक हो जाते हैं । तब उसको सुरति बोलते हैं ।
वास्तविक एकादशी इसी को कहते है । वास्तविक दशरथ होना इसी को कहते हैं । राम राम सब कोय कहे । दशरथ कहे न कोय । एक बार दशरथ कहो । फ़ेर मरन न होय । एकादशी यानी पांच कर्म और पांच ग्यानइन्द्रियों को एक करके प्रभु में लगा देना । दशरथ । मन राजा जो इन्द्रियों के रथ पर सवार होकर दसों दिशाओं में दौडता रहता है । उसे समेटकर एकाग्र और निश्चल अवस्था से प्रभु में लगा देना । एक बार दशरथ कहना होता है । संत मन होने पर इसमें जीव वासना रूपी कालिख मिट जाती है । और ये दिव्यता युक्त हो जाता है । परमहंस जो संत से ऊंची स्थिति है । इसमें मन खत्म हो जाता है । हंसा परमहंस जब हुय जावे । पारब्रह्म परमात्मा साफ़ साफ़ दिखलावे । इसके बाद की जो ऊंची स्थिति है । वह गोपनीय है । पारब्रह्म ही ईश्वर से ऊंची स्थिति है । हिरण्यगर्भ । ईश्वर और विराट ये तीन मुख्य स्थितियां होती हैं । जो समस्त ऐश्वर्य से युक्त हो उसको ईश्वर कहतें हैं ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
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2 टिप्‍पणियां:

Ashutosh Bajpai ने कहा…

बहुत ही अच्छी जानकारी

Ashutosh Bajpai ने कहा…

बहुत ही अच्छी जानकारी.

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