गुरुवार, नवंबर 17, 2011

विश्व एक स्वपन है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 7

जनक उवाच - मय्यनंतमहांभोधौ विश्वपोत इतस्ततः । भृमति स्वांतवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता । 7-1
जनक बोले - मुझ । अनंत महासागर में । विश्व रूपी जहाज । अपनी अन्तः वायु से । इधर उधर घूमता है । पर इससे । मुझमें । विक्षोभ नहीं होता है । 1
मय्यनंतमहांभोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः । 7-2
मुझ अनंत । महासागर में । विश्व रूपी लहरें । माया से । स्वयं ही । उदित और अस्त । होती रहती हैं । इससे मुझमें । वृद्धि या क्षति नहीं होती है । 2
मय्यनंतमहांभोधौ विश्वं नाम विकल्पना । अतिशांतो निराकार एतदेवाहमास्थितः । 7-3
मुझ अनंत महासागर में विश्व एक अवास्तविकता ( स्वपन ) है । मैं अति शांत और निराकार रूप से स्थित हूँ । 3
नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरंजने । इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्तितः । 7-4
उस अनंत । और निरंजन । अवस्था में । न मैं का भाव है । और न कोई । अन्य भाव ही । इस प्रकार असक्त । बिना किसी इच्छा के । और शांत रूप से । मैं स्थित हूँ । 4
अहो चिन्मात्रमेवाहं इन्द्रजालोपमं जगत । इति मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना । 7-5
आश्चर्य है । मैं शुद्ध चैतन्य हूँ । और यह जगत । असत्य जादू के समान है । इस प्रकार । मुझमें । कहाँ और कैसे । अच्छे (उपयोगी) और बुरे (अनुपयोगी) की । कल्पना आ जाती है । 5

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