रविवार, जनवरी 29, 2012

कबीर द्वारा गोरखनाथ की क्लास लेना

योगी गोरखनाथ प्रतापी । तासो तेज पृथ्वी कांपी । काशी नगर में सो पग परहीं । रामानन्द से चर्चा करहीं ।
चर्चा में गोरख जय पावै । कंठी तोरै तिलक छुड़ावै । सत्य कबीर शिष्य जो भयऊ । यह वृतांत सो सुनि लयऊ ।
गोरख के डर के मारे । वैरागी नहीं भेष सवारे । तब कबीर आज्ञा अनुसारा । वैष्णव सकल स्वरूप संवारा ।
सो सुधि गोरख जो पायौ । काशी नगर शीघ्र चल आयौ । रामानन्द को खबर पठाई । चर्चा करो मेरे संग आई ।
रामानन्द की पहली पौरी । सत्य कबीर बैठे तीस ठौरी । कह कबीर सुन गोरखनाथा । चर्चा करो हमारे साथा ।
प्रथम चर्चा कर संग मेरे । पीछे मेर गुरु को टेरे । बालक रूप कबीर निहारी । तब गोरख ताहि वचन उचारी ।
कबके भए वैरागी कबीर जी । कबसे भए वैरागी । नाथ जी जब से भए वैरागी । मेरी आदि अंत सुधि लागी ।
धूंधूकार आदि को मेला । नहीं गुरु नहीं था चेला । जब का तो हम योग उपासा । तब का फिरूं अकेला ।
धरती नहीं जद की टोपी दीना । बृह्मा नहीं जद का टीका । शिव शंकर से योगी । न थे जदका झोली शिका ।
द्वापर को हम करी फावड़ी । त्रेता को हम दंडा । सतयुग मेरी फिरी दुहाई । कलियुग फिरौ नौ खण्डा ।
गुरु के वचन साधु की संगत । अजर अमर घर पाया । कहैं कबीर सुनो हो गोरख । मैं सब को तत्व लखाया ।
जो बूझे सोई बावरा । क्या है उमृ हमारी । असंख युग प्रलय गई । तब का बृह्मचारी ।
कोटि निरंजन हो गए । परलोक सिधारी । हम तो सदा महबूब हैं । स्वयं बृह्मचारी ।
अरबों तो बृह्मा गए । उनन्चास कोटि कन्हैया । सात कोटि शम्भू गए । मोर एक नहीं पलैया ।
कोटिन नारद हो गए । मुहम्मद से चारी । देवतन की गिनती नहीं है । क्या सृष्टि विचारी ।
नहीं बुढ़ा नहीं बालक । नाहीं कोई भाट भिखारी । कहैं कबीर सुन हो गोरख । यह है उमृ हमारी ।
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अवधु अविगत से चल आया । कोई मेरा भेद मर्म नहीं पाया ।
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा । बालक हवे दिखलाया । काशी नगर जल कमल पर डेरा । तहाँ जुलाहे पाया ।
माता पिता मेरे कछु नहीं । ना मेरे घर दासी । जुलहा को सुत आन कहाया । जगत करे मेरी हांसी ।
पांच तत्व का धड़ नहीं मेरा । जानूं ज्ञान अपारा । सत्य स्वरूपी नाम साहिब का । सो है नाम हमारा ।
अधर दीप गगन गुफा में । तहां निज वस्तु सारा । ज्योति स्वरूपी अलख निरंजन । धरता ध्यान हमारा ।
हाड चाम लोहू नहीं मोरे । जाने सत्य नाम उपासी । तारन तरन अभय पद दाता । मैं हूं कबीर अविनासी ।

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