रविवार, जनवरी 29, 2012

युधिष्ठर का अश्वमेघ यज्ञ

व्यंजन छत्तीसों परोसिया । जहाँ द्रौपदी रानी । बिन आदर सत्कार के । कहे शंख ना वानी ।
पाँच गिरासी वाल्मीक । पाँचे बार बोले । आगे शंख पंचायन । कपाट ना खोले ।
बोले कृष्ण महावली । त्रिभुवन के राजा । वालमीक प्रसाद से । कान कान क्यों ना बाजा ।
द्रौपदी सेती कृष्ण देव । जब ऐसे भाखा । वाल्मीक के चरनों की । तेरे ना अभिलाषा ।
प्रेम पंचायन भूख है । अन्न जग का खाजा । ऊँच नीच द्रौपदी कहा । शंख कान कान यों नहीं बाजा । 
वाल्मीक के चरनों की । लई द्रौपदी धारा । शंख पंचायन बाजिया । कान कान झंकारा ।
सुनत पंचायन शंख रे । पाण्डव बन्ध छुटी । पाण्डु राजा पारिंग हुये । धर ध्यान अनूठी ।
स्वपच शंख सब करत हैं । नीच जाति विश चूक । पौहुमी बिगसी स्वर्ग सब । खिले जो पर्वत रूंख  ।
करी द्रौपदी दिल मांजना । स्वपच चरन धोये । बाजा शंख सर्व कला । रहे आवाज गोये ।
द्रौपदी चरणामृत लिये । स्वपच शंख नहीं कीन । बाजया शंख असंख्य धुनि । गण गन्धर्व लव लीन ।
फ़िर पाण्डव की यज्ञ में । शंख पंचायन  टेर । द्वादश कोटि पण्डित जहाँ । पङी सभन की मेर ।
करी कृष्ण भगवान कू । चरणामृत सों प्रीत । शंख पपंचायन जब बाजया । लिया  द्रौपदी सीत ।
द्वादश कोटि पण्डित जहाँ । और बृह्मा विष्णु महेश । चरण लिये जगदीश कू । जिस कू राता शेष ।
वालमीक के बाल सामी । नहीं तीनों लोक । सुर नर मुनि जन कृष्ण सुधी । पाण्डव पाई पोस ।
वाल्मीक बैकुण्ठ परी । स्वर्ग लगाई लात । शंख पंचायन घुरत है । गण गन्धर्व ऋषि मात ।
स्वर्ग लोक के देवता । किन्हें ना पूरया । स्वपच सिंहासन बैठे । बाजया अगम अगाध ।
पण्डित द्वादश कोटि थे । शाहिदे से सुर बीन । सहस अठासी देव में । कोई  ना पद में लीन ।
बाजया शंख स्वर्ग सुनया । चौदह  भवन  उच्चार । तैतीसों तत्त ना लहया । किन्हीं न पाया पार ।
सुपच रूप धरि आईया । सतगुरु पुरुष कबीर । तीन लोक की मेदनी । सुर नर मुनिजन भीर । 
सुपच रूप धरि आईया । सब देवन का देव । कृष्णचन्द्र पग धोईया । करी तास की सेव ।
पांचैं पंडौं संग हैं । छठे कृष्ण मुरारि । चलिये हमरी यज्ञ में । समर्थ सिरजनहार । 
सहंस अठासी ऋषि जहां । देवा तैतीस कोटि । शंख न बाज्या तास तैं । रहे चरण में लोटि ।
पंडित द्वादश कोटि हैं । और चौरासी सिद्ध । शंख न बाज्या तास तैं । पिये मान का मध ।
पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में । सतगुरु किया पियान । पांचैं पंडौं संग चलैं । और छठा भगवान ।
सुपच रूप को देखि करि । द्रौपदी मानी शंक । जानि गये जगदीश गुरु । बाजत नाहीं शंख । 
छप्पन भोग संजोग करि । कीनें पांच गिरास । द्रौपदी के दिल दुई हैं । नाहीं दृढ़ विश्वास ।
पांचैं पंडौं यज्ञ करी । कल्पवृक्ष की छांहिं । द्रौपदी दिल बंक हैं । शंख अखण्ड बाज्या नांहि । 
छप्पन भोग न भोगिया । कीन्हें पंच गिरास । खड़ी द्रौपदी उनमुनी । हरदम घालत श्वास ।
बोलै कृष्ण महाबली । क्यूं बाज्या नहीं शंख । जानराय जगदीश गुरु । काढत है मन बंक । 
द्रौपदी दिल कूं साफ करि । चरण कमल ल्यौ लाय । बालमीक के बाल सम । त्रिलोकी नहीं पाय ।
चरण कमल कूं धोय करि । ले द्रौपदी प्रसाद । अंतर सीना साफ होय । जरैं सकल अपराध । 
बाज्या शंख सुभान गति । कण कण भई अवाज । स्वर्ग लोक बानी सुनी । त्रिलोकी में गाज ।
पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में । आये नजर निहाल । जम राजा की बंधि में । खल हल पर्या कमाल । 
अचला का अंग । सत ग्रन्थ साहिब । पृष्ठ नं. 359 

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