रविवार, जनवरी 29, 2012

कबीर और कालपुरुष बातचीत - काल का जाल

सुनो धर्मराया । हम संखों हंसा पद परसाया ।
जिन लीन्हा हमरा प्रवाना । सो हंसा हम किए अमाना ।
द्वादस पंथ करूं मैं साजा । नाम तुम्हारा ले करूं अवाजा ।
द्वादस यम संसार पठहो । नाम तुम्हारे पंथ चलैहो ।
प्रथम दूत मम प्रगटे जाई । पीछे अंश तुम्हारा आई ।
यही विधि जीव न को भरमाऊं । पुरुष नाम जीवन समझाऊं ।
द्वादस पंथ नाम जो लैहे । सो हमरे मुख आन समै है ।
कहा तुम्हारा जीव नहीं माने । हमरी ओर होय बाद बखानै ।
मैं दृढ़ फंदा रची बनाई । जामें जीव रहे उरझाई ।
देवल देव पाषान पूजाई । तीर्थ वृत जप तप मन लाई ।
यज्ञ होम अरू नेम अचारा । और अनेक फंद मैं डारा ।
जो ज्ञानी जाओ संसारा । जीव न मानै कहा तुम्हारा ।
ज्ञानी कहे सुनो अन्यायी । काटो फंद जीव ले जाई ।
जेतिक फंद तुम रचे विचारी । सत्य शबद तै सबै बिंडारी ।
जौन जीव हम शब्द दृढावै । फंद तुम्हारा सकल मुकावै ।
चौका कर प्रवाना पाई । पुरुष नाम तिहि देऊं चिन्हाई ।
ताके निकट काल नहीं आवै । संधि देखी ताकहं सिर नावै ।
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कबीर मानुष जन्म दुर्लभ है । मिले न बारम्बार । तरूवर से पत्ता टूट गिरे । बहुर न लगता डारि ।
साहब के दरबार में । गाहक कोटि अनन्त ।  चार चीज चाहते । रिद्ध  सिद्ध मान महन्त ।
बृह्मरन्ध्र के घाट को । खोलत है कोई एक । द्वारे से फ़िर जात है । ऐसे बहुत अनेक ।
बीजक की बातें कहें । बीजक नाहीं हाथ । प्रथ्वी डूवन उतरे कह कह मीठी बात ।
बीजक की बातें कहें । बीजक नाहीं पास । औरन को प्रमोधहि । आपन चले निराश ।
सन्त मिलन को चालिये । तज माया अभिमान । ज्यों ज्यों पग आगे धरे । कोटिन यज्ञ  समान ।
साधु भूखा भाव का । धन का भूखा नाहिं । जो कोई धन का भूखा । वो तो साधु नाहिं ।

युधिष्ठर का अश्वमेघ यज्ञ

व्यंजन छत्तीसों परोसिया । जहाँ द्रौपदी रानी । बिन आदर सत्कार के । कहे शंख ना वानी ।
पाँच गिरासी वाल्मीक । पाँचे बार बोले । आगे शंख पंचायन । कपाट ना खोले ।
बोले कृष्ण महावली । त्रिभुवन के राजा । वालमीक प्रसाद से । कान कान क्यों ना बाजा ।
द्रौपदी सेती कृष्ण देव । जब ऐसे भाखा । वाल्मीक के चरनों की । तेरे ना अभिलाषा ।
प्रेम पंचायन भूख है । अन्न जग का खाजा । ऊँच नीच द्रौपदी कहा । शंख कान कान यों नहीं बाजा । 
वाल्मीक के चरनों की । लई द्रौपदी धारा । शंख पंचायन बाजिया । कान कान झंकारा ।
सुनत पंचायन शंख रे । पाण्डव बन्ध छुटी । पाण्डु राजा पारिंग हुये । धर ध्यान अनूठी ।
स्वपच शंख सब करत हैं । नीच जाति विश चूक । पौहुमी बिगसी स्वर्ग सब । खिले जो पर्वत रूंख  ।
करी द्रौपदी दिल मांजना । स्वपच चरन धोये । बाजा शंख सर्व कला । रहे आवाज गोये ।
द्रौपदी चरणामृत लिये । स्वपच शंख नहीं कीन । बाजया शंख असंख्य धुनि । गण गन्धर्व लव लीन ।
फ़िर पाण्डव की यज्ञ में । शंख पंचायन  टेर । द्वादश कोटि पण्डित जहाँ । पङी सभन की मेर ।
करी कृष्ण भगवान कू । चरणामृत सों प्रीत । शंख पपंचायन जब बाजया । लिया  द्रौपदी सीत ।
द्वादश कोटि पण्डित जहाँ । और बृह्मा विष्णु महेश । चरण लिये जगदीश कू । जिस कू राता शेष ।
वालमीक के बाल सामी । नहीं तीनों लोक । सुर नर मुनि जन कृष्ण सुधी । पाण्डव पाई पोस ।
वाल्मीक बैकुण्ठ परी । स्वर्ग लगाई लात । शंख पंचायन घुरत है । गण गन्धर्व ऋषि मात ।
स्वर्ग लोक के देवता । किन्हें ना पूरया । स्वपच सिंहासन बैठे । बाजया अगम अगाध ।
पण्डित द्वादश कोटि थे । शाहिदे से सुर बीन । सहस अठासी देव में । कोई  ना पद में लीन ।
बाजया शंख स्वर्ग सुनया । चौदह  भवन  उच्चार । तैतीसों तत्त ना लहया । किन्हीं न पाया पार ।
सुपच रूप धरि आईया । सतगुरु पुरुष कबीर । तीन लोक की मेदनी । सुर नर मुनिजन भीर । 
सुपच रूप धरि आईया । सब देवन का देव । कृष्णचन्द्र पग धोईया । करी तास की सेव ।
पांचैं पंडौं संग हैं । छठे कृष्ण मुरारि । चलिये हमरी यज्ञ में । समर्थ सिरजनहार । 
सहंस अठासी ऋषि जहां । देवा तैतीस कोटि । शंख न बाज्या तास तैं । रहे चरण में लोटि ।
पंडित द्वादश कोटि हैं । और चौरासी सिद्ध । शंख न बाज्या तास तैं । पिये मान का मध ।
पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में । सतगुरु किया पियान । पांचैं पंडौं संग चलैं । और छठा भगवान ।
सुपच रूप को देखि करि । द्रौपदी मानी शंक । जानि गये जगदीश गुरु । बाजत नाहीं शंख । 
छप्पन भोग संजोग करि । कीनें पांच गिरास । द्रौपदी के दिल दुई हैं । नाहीं दृढ़ विश्वास ।
पांचैं पंडौं यज्ञ करी । कल्पवृक्ष की छांहिं । द्रौपदी दिल बंक हैं । शंख अखण्ड बाज्या नांहि । 
छप्पन भोग न भोगिया । कीन्हें पंच गिरास । खड़ी द्रौपदी उनमुनी । हरदम घालत श्वास ।
बोलै कृष्ण महाबली । क्यूं बाज्या नहीं शंख । जानराय जगदीश गुरु । काढत है मन बंक । 
द्रौपदी दिल कूं साफ करि । चरण कमल ल्यौ लाय । बालमीक के बाल सम । त्रिलोकी नहीं पाय ।
चरण कमल कूं धोय करि । ले द्रौपदी प्रसाद । अंतर सीना साफ होय । जरैं सकल अपराध । 
बाज्या शंख सुभान गति । कण कण भई अवाज । स्वर्ग लोक बानी सुनी । त्रिलोकी में गाज ।
पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में । आये नजर निहाल । जम राजा की बंधि में । खल हल पर्या कमाल । 
अचला का अंग । सत ग्रन्थ साहिब । पृष्ठ नं. 359 

कबीर द्वारा गोरखनाथ की क्लास लेना

योगी गोरखनाथ प्रतापी । तासो तेज पृथ्वी कांपी । काशी नगर में सो पग परहीं । रामानन्द से चर्चा करहीं ।
चर्चा में गोरख जय पावै । कंठी तोरै तिलक छुड़ावै । सत्य कबीर शिष्य जो भयऊ । यह वृतांत सो सुनि लयऊ ।
गोरख के डर के मारे । वैरागी नहीं भेष सवारे । तब कबीर आज्ञा अनुसारा । वैष्णव सकल स्वरूप संवारा ।
सो सुधि गोरख जो पायौ । काशी नगर शीघ्र चल आयौ । रामानन्द को खबर पठाई । चर्चा करो मेरे संग आई ।
रामानन्द की पहली पौरी । सत्य कबीर बैठे तीस ठौरी । कह कबीर सुन गोरखनाथा । चर्चा करो हमारे साथा ।
प्रथम चर्चा कर संग मेरे । पीछे मेर गुरु को टेरे । बालक रूप कबीर निहारी । तब गोरख ताहि वचन उचारी ।
कबके भए वैरागी कबीर जी । कबसे भए वैरागी । नाथ जी जब से भए वैरागी । मेरी आदि अंत सुधि लागी ।
धूंधूकार आदि को मेला । नहीं गुरु नहीं था चेला । जब का तो हम योग उपासा । तब का फिरूं अकेला ।
धरती नहीं जद की टोपी दीना । बृह्मा नहीं जद का टीका । शिव शंकर से योगी । न थे जदका झोली शिका ।
द्वापर को हम करी फावड़ी । त्रेता को हम दंडा । सतयुग मेरी फिरी दुहाई । कलियुग फिरौ नौ खण्डा ।
गुरु के वचन साधु की संगत । अजर अमर घर पाया । कहैं कबीर सुनो हो गोरख । मैं सब को तत्व लखाया ।
जो बूझे सोई बावरा । क्या है उमृ हमारी । असंख युग प्रलय गई । तब का बृह्मचारी ।
कोटि निरंजन हो गए । परलोक सिधारी । हम तो सदा महबूब हैं । स्वयं बृह्मचारी ।
अरबों तो बृह्मा गए । उनन्चास कोटि कन्हैया । सात कोटि शम्भू गए । मोर एक नहीं पलैया ।
कोटिन नारद हो गए । मुहम्मद से चारी । देवतन की गिनती नहीं है । क्या सृष्टि विचारी ।
नहीं बुढ़ा नहीं बालक । नाहीं कोई भाट भिखारी । कहैं कबीर सुन हो गोरख । यह है उमृ हमारी ।
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अवधु अविगत से चल आया । कोई मेरा भेद मर्म नहीं पाया ।
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा । बालक हवे दिखलाया । काशी नगर जल कमल पर डेरा । तहाँ जुलाहे पाया ।
माता पिता मेरे कछु नहीं । ना मेरे घर दासी । जुलहा को सुत आन कहाया । जगत करे मेरी हांसी ।
पांच तत्व का धड़ नहीं मेरा । जानूं ज्ञान अपारा । सत्य स्वरूपी नाम साहिब का । सो है नाम हमारा ।
अधर दीप गगन गुफा में । तहां निज वस्तु सारा । ज्योति स्वरूपी अलख निरंजन । धरता ध्यान हमारा ।
हाड चाम लोहू नहीं मोरे । जाने सत्य नाम उपासी । तारन तरन अभय पद दाता । मैं हूं कबीर अविनासी ।

गुरुवार, जनवरी 26, 2012

माया और भक्ति दोनों का एक साथ रहना सम्भव नहीं है

74 प्रश्न - महाराज जी ! कभी कभी भजन ध्यान का अभ्यास करते समय सिर और आंखों में दर्द होने लगता है । इसका क्या उपाय करें ?
उत्तर - ऐसे समय में यह अच्छा है कि धीरे धीरे अभ्यास को बढाना चाहिये । ऐसा करने से यदि दर्द सिर में या आंखों में होने लगे । तो कुछ देर के लिये अभ्यास बन्द करके आराम कर ले । घूम टहल ले । कुछ देर के विश्राम के बाद अभ्यास करे । विश्राम कर लेने के बाद पुन: अभ्यास आरम्भ कर देना चाहिये । विश्राम कर लेने पर दर्द शान्त हो जायेगा । यानी दर्द ठीक हो जायेगा । जब अभ्यासी अपनी सुरत को ऊपर की ओर चढाता है । या खींचता है । तो उसमें आंख की पुतली ऊपर की ओर खिंचती है । और उसमें जोर लगता है । इसी से आंख में तथा सिर में दर्द होता है । जो अनावश्यक है । जब तक आदत न पड जाय । तब तक जबरदस्ती नहीं करना चाहिये । जितना जितना सहन होता जावे । उतना ही जोर लगाना चाहिये । उससे अधिक जोर लगाने से रक्त का दबाव ऊपर की तरफ़ आवश्यकता से अधिक होने लगता है । और नाडियों में खून अधिक भर जाने के कारण दर्द होने लगता है । यह एक अनावश्यक कार्य है । भजन । सुमिरन । ध्यान । सुख आसन पर बैठकर आराम पूर्वक सहजता सरलता के साथ आराम और आसानी के साथ करना चाहिये । सहज योग में सहजता के साथ साधना करना चाहिये । जबरदस्ती करनें में हठ योग कहलाने लगता है ।
साधक का भजन । सुमिरन । ध्यान के करने में जितना मन लगेगा । उतना ही आनन्द आएगा । आनन्द मिलने

पर ही उत्साह बढता जाता है । और उसके साथ साथ अभ्यास का समय तथा ध्यान में आनन्द बढता जाता है । कभी कभी तो ऐसा हो जाता है कि भजन, ध्यान में बैठकर समय का पता नहीं लगता कि कितना समय बीत गया । ऐसी दशा में यह आवश्यक है कि भजन, अभ्यास में बैठते समय यह इरादा करके बैठे कि एक घंटा, दो घण्टा या जितनी देर बैठने की मन में इच्छा हो । इरादा करके बैठे कि इतनी देर भजन, सुमिरन व ध्यान के साधना करूंगा । ऐसा करने से सुरत निश्चित समय पर नीचे उतर आवेगी । और आप जितना सोच कर बैठे हैं कि इतना अभ्यास करूंगा । वह भी पूरा हो जायेगा ।
जिसे सन्त सदगुरू के श्री चरणों का भरोसा है । और अपने श्री सदगुरू देव महाराज के श्री चरण कमलों में जिसका चित्त जुडा हुआ है । श्री सदगुरू सदा उनके साथ हैं । और सदा उसके रक्षक तथा उसके सहाई हैं । श्री सदगुरू देव जी महाराज का भजन, ध्यान ही जीव का सच्चा संगी साथी है । यही इस लोक में भी तथा परलोक में भी रक्षक है । यही भजन, ध्यान ही सर्व सुखों की खान है । यदि श्री सदगुरू का भजन, ध्यान नियमित नियमानुसार चलता रहा हो । उस जीव का सदा कल्याण है ।


सतगुरू सम हितू कोई नहीं । देखा सब संसार । प्रणत पाल गुरूदेव जी । पल पल करैं संभार ।
सन्त महापुरूषों का कहना है कि संसारी भोग विलास ह्रदय के अन्दर ठौर न पाने पावें । अगर उन्होंने दिल में घर कर लिया । तो अन्दर ह्रदय में श्री सदगुरू भगवान का दर्शन होने में बाधा होगी ।
दिल है तेरा एक । इसमें ऐ हाजी । उलफ़तें दो दो । समा सकतीं नहीं ।
माया और भक्ति दोनों का एक साथ रहना सम्भव नहीं है । यह दिल मालिक का मन्दिर है । श्री सदगुरू देव जी महाराज की उपासना का स्थान है । मायावी विषय विकारों के लिये इसे मुसाफ़िर खाना नहीं बनाना चाहिये । इसे विषय वासना का घर बनाकर नहीं रखना चाहिये । यह एक देवालय है । यह पूजा का सर्वश्रेष्ठ यानी पवित्र मन्दिर है । इसे साफ़ सुथरा एवं शुद्ध तथा पवित्र बनाये रखना चाहिये । अत: सांसारिक सुख ऐश्वर्यों में मन को नहीं फ़ंसाना चाहिये । सन्तों महापुरूषों का कहना है कि श्री सदगुरू देव जी महाराज के उपदेशानुसार भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान करते हुए सदा धार्मिक रीति से चलते हुए जीवन व्यतीत करना ही साधकों, गुरूमुखों का परम धर्म है । भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । ध्यान । दर्शन । नियमित नियमानुसार सदा सदा करते रहना चाहिये । यही साधक के जीवन की पूंजी है । जिस पर आचरण कर लोक तथा परलोक में सुख की प्राप्ति होती है ।

प्रत्येक साधक व अभ्यासी की मनोदशा अलग अलग होती है । पर यह तीन बातों पर निर्भर है - 1 उसके पिछले तथा वर्तमान जन्मों के कर्मों का प्रभाव । 2 परमार्थ की प्राप्ति की कितनी तडप है । तथा कितनी विरह वेदना उसके मन में पैदा हो चुकी है । 3 सन्त सदगुरू के श्री चरण कमलों में साधक को भजन । सुमिरन । ध्यान में रस मिलता है । तथा उसका मन भजन । सुमिरन । ध्यान में लगता है । अर्थात प्रत्येक अभ्यासी को चाहिये कि बराबर अपनी हालत पर दृष्टि रखता रहे । यानी इस बात की परख करता रहे कि उसकी क्या स्थिति है । जब किसी बात में कमी दिखे । तो सच्चे मन से सुधार करने का प्रयत्न करे । श्री सदगुरू देव जी महाराज की दया के बिना विवेक की उत्तपत्ति नहीं होती । और सदगुरू की कृपा के बिना सहज में ही सत संगति की प्राप्ति नहीं होती । सदगुरू की दया व उनकी संगति आनन्द व कल्याण का मूल है । श्री सदगुरू की संगति की प्राप्ति ही सभी सुखों का फ़ल है । और सभी साधक फ़ूल है । श्री सदगुरू की संगति पाकर दुष्ट भी उसी तरह सुधर जाते हैं । जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावन बन जाता है । अर्थात सोने में परिवर्तित हो जाता है । फ़िर भी प्रभु से क्षमा प्रर्थना करता रहे । दया और कृपा की याचना करता रहे । तथा भविष्य के लिये पूर्णरूप से सतर्क रहे कि जो त्रुटि अब तक हो गई है । दुबारा न हो जाय । इसको पूरी तरह से याद रखो । फ़िर भी सच्चे मन से प्रयत्न करने से प्रभु की कृपा का सहारा मिल जाता है । और भजन । सुमिरन । ध्यान की साधना में मन का ठहराव अधिक होने लगता है । तथा निर्मल रस व आनन्द मिलने लगता है । इसी प्रकार धीरे धीरे अन्दर की सफ़ाई होती रहती है । और साधक को स्वयं अपने आध्यात्मिक उन्नति का आभास होने लगता है ।


बहुधा ऐसा होता है कि किसी किसी अभ्यासी को भजन, ध्यान करते समय अन्दर में गुरू के स्वरूप के दर्शन कभी होते हैं । कभी नहीं होते हैं । तो न होने की दशा में निराश नहीं होना चाहिये । और यह सोच कर हताश नहीं होना चाहिये कि मेरे अभ्यास में बहुत बडी कमी है । साधक को चाहिये कि जिस आन्तरिक केन्द्र पर श्री सदगुरू ने उसे अभ्यास करने को बताया है । उसी स्थान पर सुरत या मन को जमाकर सहसदल कमल पर ठहरने लगेंगे । और भजन, सुमिरन, ध्यान में मन लगने लगेगा । यदि मन नहीं ठहरता । तो इसका एकमात्र कारण यही है कि भजन, सुमिरन, ध्यान नियमित नियमानुसार नहीं हो रहा है । और अन्दर में या बाहर में सदगुरू के प्रति प्रेम में कमी पड रही है । यदि श्री सदगुरू के प्रति प्यार होगा । तो अवश्य ही उस प्यार की डोर के द्वारा या सहारे मन व सुरत की धार ऊपर की ओर चढेगी । और जब ऊपर चढेगी । तो भजन, सुमिरन, ध्यान का आनन्द अवश्य प्राप्त होगा । इसमें कोई संशय नहीं है । इसलिये साधक के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि प्रेम तथा श्रद्धा के साथ अभ्यास करता रहे । यदि प्रेम में कोई कसर है । और चाव भी कम है । तो ख्याली तौर पर साधक को चाहिये कि श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री चरणों में माथा रखकर दीन भाव से, आर्तभाव से प्रेम की भीख मांगे । इसी प्रकार बारबार दीन भाव से प्रार्थना करने से अवश्य ही प्रेम व दया की बख्शीश होती है । प्रेम की प्राप्ति होने पर उस प्रेम रूपी पौधे को 


श्रद्धा के जल से निरन्तर सींचता रहे । बार बार या जब जब याद आ जाय । तब तब ख्याली तौर पर श्री सदगुरू भगवान के श्री चरणों में सिर झुकाकर बारम्बार दण्डवत प्रणाम करते रहना चाहिये । इस प्रकार करते करते भजन, सुमिरन, ध्यान के करने में रस मिलने लग जायेगा । और सदगुरू का दर्शन अन्दर में होता रहेगा । इस प्रकार के दर्शन को सन्त सदगुरू की असली दया और कृपा का सूचक समझना चाहिये । जब कभी इस प्रकार के दर्शन मिल जाते हैं । तो साधक की प्रीति और प्रतीति बढ जाती है ।
साधक को चाहिये कि सत्यराज्य के प्रत्येक चक्र पर या मण्डल पर अपने श्री सदगुरू द्वारा बताया हुआ भजन, सुमिरन, ध्यान का अभ्यास बढाता जाय । किसी किसी सन्त ने तो ऐसा कहा है कि एक चक्र पर या मण्डल पर कम से कम दो वर्ष अभ्यास करें । किन्तु यह कोई आवश्यक नहीं है । यह तो साधना पर व प्रेम व निष्ठा पर निर्भर करता है । उसके पुरूषार्थ पर निर्भर करता है । प्रत्येक साधक की अलग अलग स्थिति होती है । उसी के अनुसार उसकी सुरत की चाल होती है । और फ़िर इस सिलसिले में सदगुरू कृपा पर बहुत कुछ निर्भर करता है । प्रत्येक साधक की अलग अलग स्थिति होती है । उसी के अनुसार उसकी सुरत की चाल होती है । और फ़िर इस सिलसिले में सदगुरू कृपा पर बहुत कुछ निर्भर करता है । जितना जिसका सदगुरू के प्रति समर्पण होगा । 


जितना कोई अपने आपको श्री सदगुरू में लय कर चुका होगा । जितना जिसका गुरू के प्रति और गुरू समाज के प्रति आचरण उज्जवल हो चुका होगा । उसी के अनुसार उसकी प्रगति होगी । दशम 10 द्वार या सतलोक तक । या अलख । अगम लोक तथा अनामी पद तक अपनी सुरत को पहुंचाकर वहां ठहर जायं । इसमें एक जन्म भी लग सकता है । और कई जन्म भी । पर बिना श्री सदगुरू देव जी महाराज की असीम कृपा व दया के यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है ।
श्री सदगुरू देव जी महाराज की दया रूपी शरण संगति में साधक को धर्म । अर्थ । काम । मोक्ष चारों फ़ल प्राप्त होते हैं । तथा उनकी संगति से साधक के मन के सारे विकार दूर हो जाते हैं । जिस प्रकार पारस के स्पर्श से लोहा सुन्दर कंचन बन जाता है । उसी प्रकार श्री सदगुरू देव जी महाराज की पावन संगति से साधक का मन भी उज्जवल एवं निर्मल बन जाता है । यह पूर्ण सत्य है । श्री सदगुरू की ही शरण संगति में तो साधक के मलिन मन की पूरी तरह साफ़ सफ़ाई होती है ।
गुरू नाम सुमिरण किये । तन मन निर्मल होय । तिस सौभागी जीव का । पला न पकडे कोय ।
रूहानी शब्द - आपको हर पल याद करूं । हिरदय में ए सदगुरू । सदा आप ही का ध्यान धरूं ।
भूलीं न इक पल भी । सुमिरन भजन सदा करूं । हो आपका ही दर्शन ।
यही कामना है मेरी । मेरे रोम रोम सदगुरू । छवि प्यारी बसी हो आपकी ।
जग की न चाह रहे । बस आप ही आप सदगुरू । हिरदय में बसें मेरे ।

युग युग तू ही तू । बनूं दास आपका । आपकी सेवा पूजा ही । सदगुरू हो धर्म मेरा ।
सन्त महापुरूषों का कहना है कि साधक के लिये सदगुरू की भक्ति करना ही मुख्य आधार है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के कमलवत श्री चरणों को पकड लें । और अपने आपको उनको पूरी तरह से समर्पण कर दें । यदि साधक अपने को पूरी तरह से श्री सदगुरू देव में विलीन कर दे । अपना आपा भाव खत्म हो जाय । तो श्री सदगुरू देव जी महाराज की भक्ति आसानी से प्राप्त हो जाती है ।
सदगुरू शिष की आतमा । शिष सतगुरू की देह । लखा जो चाहे अलख को । इनहीं में लख लेय ।
यह बहुत कठिन कार्य है । कोई विरला साधक, जिज्ञासु ही यहां तक पहुंच सकता है । पर जिसके पूर्व जन्म के संस्कार अच्छे हों । केवल थोडी कसर रह गई हो । उस साधक को उत्साह के साथ सोचना तथा करना भी चाहिये कि मेरे पूर्व जन्म के संस्कार अच्छे रहे हैं । और अच्छे हैं भी । तथा आगे भी मालिक की दया से अच्छे रहेंगे । शेष सभी अपनी अपनी योग्यता तथा संस्कार के अनुसार पाते हैं ।
रास्ता चलता जाय । निराश नहीं होना चाहिये । यदि रास्ते पर बराबर चलता रहे । तो एक न एक दिन मंजिल पर पहुंच ही जायेगा । किन्तु मनुष्य जन्म अनमोल है । यह जन्म बार बार नहीं मिलता । इसे अमूल्य मानकर इसी जन्म में अपने लक्ष्य तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिये ।
इसलिये हर समय श्री सदगुरू देव जी महाराज के भजन, सुमिरन, ध्यान और सेवा पूजा को तरजीह देने चाहिये । ताकि भक्ति की ताकत पैदा हो । क्योंकि इसी एक बात के अन्दर बन्धन और मोक्ष का भेद छिपा हुआ है । जिस 


सेवक के दिल में मालिक के प्रति श्रद्धा और प्रेम दोनों बने रहते हैं । उसका एक न एक दिन अवश्य उद्धार होगा । क्योंकि मालिक का प्रेम तथ नाम का भजन और भक्ति संसार के मोह पाश को तोडेगा । मालिक की भक्ति की शक्ति जिसमें उत्पन्न हो गयी । उसी भक्त पर मालिक की खास दया समझनी चाहिये । क्योंकि श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री चरणों की भक्ति ऐसी है । जो मालिक और भक्त के बीच जितने पर्दे हैं । उन सबको साफ़ करके जीव को मोक्ष की प्राप्ति करा देती है ।
दासनदास ने भी गहा । सदगुरू चरण तुम्हार । अवगुण हार चरणन पडा । कर दो अब उद्धार ।
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- ये शिष्य जिज्ञासा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।

गुरुवार, जनवरी 19, 2012

2-4 श्लोक कण्ठस्थ करने मात्र से क्या कोई साधु हो जाता है ?

61 प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! आहार आदि कैसे बनाना चाहिये ?
उत्तर - भोजन शुद्ध विचारधारा से बनाना चाहिये । भोजन बनाने वाले पर काफ़ी कुछ निर्भर करता है । भोजन बनाने वाले को नित्य कर्म करके स्नान, ध्यान करके साफ़ सुथरे वस्त्र धारण कर साफ़ सफ़ाई से भोजन बनाना चाहिये । कहावत है - जैसा खाए अन्न । वैसा होवे मन । भोजन बडी शान्ति से मौन रहकर खुश दिल होकर बनाना चाहिये । भोजन बनाते समय बोलना नहीं चाहिये । क्योंकि वही भोजन आप अपने श्री सदगुरु देव जी महाराज को भोग लगाते हैं । भोजन सदा सात्विक करना कराना चाहिये । मनुष्य का शारीरिक गठन इतना भिन्न है कि सब लोगों के लिये 1 ही नियम नहीं बनाया जा सकता है । मान लीजिये । कोई वस्तु मुझे सहन होती है । परन्तु आपके शरीर को सहन नहीं होती है । मेरा शरीर किसी वस्तु को गृहण कर सकता है । आपका शरीर शायद उसे गृहण न कर सके । इसलिये हम लोगों को अपने शरीर के अनुकूल भोजन का चयन करना चाहिये । हाँ सात्विक भोजन ही खायें खिलायें । साधारण तौर पर यह कहा जा सकता है कि भोजन भारी न हो । ये सावधानी बनाये रखकर । जिसके पेट में जो सहता है । वैसा भोजन किया जा सकता है । भजन में सहायक भोजन करना चाहिये ।
62  प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! मंत्र जागृत किस स्थान पर जल्दी होता है ?

उत्तर - आश्रम में । मन्दिर में । पंचवटी में । नदी के किनारे । सागर के किनारे । शुद्ध पवित्र स्थान पर मंत्र जल्दी जाग्रत होता है । जो लोग ठीक ठीक भजन करते हैं । वे सहज ही कुछ दिन के बाद इसे जान सकते हैं । यह समझना कठिन नहीं है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के प्रति एकनिष्ठ भाव तथा आचरण की शुद्धता से मन्त्र शीघ्र जाग्रत होता है ।
वाराणसी नगरी संसार से अलग है । महा चैतन्यमय स्थान है । यहीं पर गंगा तट के किनारे बैठकर भजन ध्यान करने वाले को 10 गुना अधिक फ़ल मिलता है । यहां छोटे बडे । धनी गरीब जो भी हैं । सभी को साधन भजन का पूर्ण अधिकार है । श्री सदगुरू देव जी महाराज सबको भक्ति । भजन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान । चिन्तन करने का पूर्ण अवसर देते हैं । श्री सदगुरू देव जी महाराज की वाणी है कि यहां पर रहने वाले सभी भक्त 1 दिन मुक्त हो जायेंगे । श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज का दर्शन । पूजा । आरती । भजन । सुमिरन । सेवा । ध्यान । चिन्तन । मनन करने वाले भक्त का मन्त्र जाग्रत तो हो ही जाता है । परन्तु तपो भूमि की अपनी 1 विशेषता है । यहां पर रहकर भजन । सुमिरन । ध्यान । अर्चन । वन्दन । पूजन करने वाले को 10 गुना अधिक लाभ मिलता है । महापुरूषों की वाणी है - गुरूद्वारे में जहां सर कटने वाला हो । वहां खरोंच लगकर रह जाती है ।
तपस्थली का विशेष महत्त्व होता है । शिकार हमेशा जंगल में होता है । देखो । शिकारी हमेशा जंगल में शिकार 


खेलने जाता है । शहर या घर में नहीं । ठीक उसी प्रकार भजन, तपस्या के लिये उचित स्थान आश्रम । तपस्थली । गुरूद्वारा है । कोई बिरला ही लाखों करोडों में गृहस्थी में रहकर मुक्ति पा सकता है । मन्त्र जाग्रत कर सकता है ।
63 प्रश्न - श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज ! क्या मठ बनाना आवश्यक है ?
उत्तर - मठ का निर्माण आवश्यक है । मठ बनाने का प्रथम उद्देश्य जीव कल्याण है । इसलिये जरूरी है । इस संसार में बहुत सारे असहाय । दीन, दुखी । अबला । विधवा । अपंग है । जिनका संसार बहिष्कार करता है । उनका जीवन यापन सबसे सुन्दर तरीकों से मठों में ही होता है । उन्हें आश्रम ही सम्मानित जीवन देता है । मठ में ऐसे दीन दुखियों को दिशा मिलती है । आत्म प्रेरणा मिलती है । जिन्होंने आश्रम का आश्रय लिया । उन्हें संसार सागर से पार जाने का रास्ता श्री सदगुरू देव जी महाराज ही दिखाते हैं । उनकी समस्त बाधाओं को वे दूर कर देते हैं । गुरू वाक्य में विश्वास रखो । जिसने भी गुरू वाणी पर विश्वास कर उनके वचनों का अक्षरश: पालन किया है । जैसा प्रभु कहें । वैसा करते गया है । उनके मन का सारा मैल धुल जाता है । और धीरे धीरे ज्ञान का प्रकाश आने लगता है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के प्रति सच्ची निष्टा । भक्ति भाव । लगन । और पूर्ण विश्वास से ही सब काम बन जाता है । श्री सदगुरू देव जी महाराज को मनुष्य रूप में मत देखो । मत देखना । शिष्य के लिये श्री सदगुरू देव जी महाराज साक्षात परबृह्म भगवान ही है ।


गुरूर्बृह्मा गुरू:विर्ष्णु: गुरूर्देवो महेश्वर: । गुरू: साक्षात परबृह्म तस्मै श्रीगुरवे नम: ।
भगवत बुद्धि से श्री सदगुरू देव जी महाराज का ध्यान । दर्शन । पूजा । सेवा । भजन । आरती करते करते शरीर और मन जब शुद्ध हो जाते हैं । तब गुरू शिष्य को अपने दिव्य स्वरूप का दिव्य दर्शन देकर कृतार्थ कर देते हैं । शुद्ध आधार । शुद्ध मन । और श्री सदगुरू देव जी महाराज के प्रति शुद्ध भाव होने पर ही प्रभु के दर्शन होते हैं । संसार में अनेकों मठ है । जन कल्याण के लिये ही खुले हैं । इनसे जन कल्याण भारी संख्या में हो भी रहा है ।
सतयुग में ध्यान करने से । त्रेता में यज्ञ करने से । द्वापर में पूजा करने से । जो फ़ल प्राप्त होता है । वह फ़ल कलियुग में केवल श्री सदगुरू देव जी महाराज के नाम का जप करने से साधक प्राप्त कर लेता है । परन्तु ऐसा कोई बिरला ही कर पाता है । रात दिन भजन । सुमिरन हो तो क्या बात है । परन्तु होता नहीं । इसलिये मठ बनाने की आवश्यकता है ।
श्री स्वामी जी ने एक दिन कहा था - देखो कलि में सिर्फ़ नाम भजन से ही सब कुछ मिल सकता है । सैकडों करोडों अश्वमेघ यज्ञों से जो पुण्य फ़ल प्राप्त होता है । वह सम्पूर्ण फ़ल सिर्फ़ नाम भजन से ही मिल जाता है । लेकिन नाम भजन रात दिन नहीं हो पाता है । न कोई कर सकता है । रात दिन भजन सुमिरन हो सके । तो क्या पूछना । पर होता नहीं है । इसीलिये सेवा कार्य शुरू किया गया है । सेवा कार्य से खूब शक्ति आती है । और भक्ति मिलती है । निष्काम कर्म करने से

भगवान मिलते हैं । गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है -
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय: । असक्तो ह्याचरन कर्म परमाप्रोति पूरूष: ।
हिमालय में जाकर तपस्या किया । गेरूआ वस्त्र धारण कर लिया । घूम फ़िर कर । भिक्षा मांग कर भोजन कर लिया । और 2-4 श्लोक कण्ठस्थ करने मात्र से क्या कोई साधु हो जाता है ? साधु होने के लिये आध्यात्मिक प्रगति होनी चाहिये । आध्यात्मिक प्रगति एकमात्र श्री सदगुरू देव जी महाराज के द्वारा ही हो सकती है । श्री सदगुरू देव जी महाराज जीवों से दर्शन । पूजा । सेवा । भजन । सुमिरन । ध्यान । आरती करवा कर उन्हें रूहानी मंजिल तक पहुंचा देते हैं ।
यदि स्कूल नहीं रहेगा । तो कहाँ पर विधार्थी अध्ययन करेंगे ? अब कोई कहे कि क्या विधा अध्ययन जरूरी है । हाँ जरूरी है । जरूरी ही नहीं अनिवार्य है । कारण कि विधालय नहीं रहेगा । शिक्षा कहाँ से ग्रहण करेगा । विधा अध्ययन कैसे करेगा ? इसलिये मठ अनिवार्य हैं । मठ नहीं रहेगा । तो भजन करने वाले साधकों के लिये भजन की शिक्षा । दीक्षा । भजन की विधि कौन बतायेगा ? सेवा भाव कहां से आयेगा । बृह्मविधा कौन बतायेगा ? इसलिये मठ बनाना जरूरी है । जरूरी ही नहीं । अनिवार्य है ।
64 प्रश्न - 1 भक्त ने 1 सन्त की शरण में जाकर प्रार्थना करते हुए पूछा - प्रभु ! सदगुरू नाम में प्रेम हो । और उनमें चित्त कैसे लगे ? इसकी कोई युक्ति बताइये ।

उत्तर - सन्त ने फ़रमाया कि श्री सदगुरू भगवान के नाम का मूल्य एवं महत्त्व जब समझ में आ जाता है । तभी उसमें प्रेम होता है । और तभी भजन, सुमिरन में मन व चित्त लगता है ।
फ़िर भक्त ने कहा - महाराज ! मूल्य और महत्व तो कुछ कुछ समझ में आता है । परन्तु उसमें चित्त नहीं लगता ।
उत्तर - तुमको कुछ समझ में नहीं आया । यदि समझ में आ गया होता । तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि नाम के भजन सुमिरन में मन न लगे । फ़िर भक्त कहता है कि - नहीं महाराज ! ऐसा तो कदापि नहीं है ।
अब सन्त ने प्रश्न किया - अच्छा बताओ । तुम्हारी मासिक आय क्या है ? भक्त ने उत्तर दिया - लगभग 15000 रूपये ।
सन्त ने फ़रमाया कि अब विचार करो । और हिसाब लगाओ । इसका अर्थ है । 500 रूपया प्रतिदिन । अर्थात रात दिन मिलाकर 24 घण्टे में 500 रूपये । तो 1 घण्टे में लगभग 21 रूपये । और 1 मिनट में लगभग 35 पैसे । 1 मिनट में तुम 35 बार तो सदगुरू भगवान के नाम का स्मरण आसानी से कर सकते हो । अर्थात जितनी देर में तुम 1 पैसा कमाते हो । उतनी देर में 1 बार प्रभु के नाम का सुमिरन तो हो सकता है । इतने पर भी तुम पैसे के लिये तो हर पल चेष्टा करते हो । परन्तु नाम के भजन, सुमिरन के लिये नहीं । अब तुम बताओ कि क्या तुमने नाम भजन, सुमिरन का मूल्य एवं महत्त्व पैसे से भी कम नहीं समझा ?
बात भक्त की समझ में आ गई । उस दिन वह सांसारिक काम काज करने के साथ नियम पूर्वक नाम का भजन,

सुमिरन करने लगा ।
65 प्रश्न - भक्त कहता है कि मेरा मन भजन, ध्यान में नहीं लगता है । इसका उपाय बताइये ।
उत्तर - अपने श्री सदगुरू देव महाराज के प्रति पूर्ण श्रद्धा व प्रेम रखने से । उनके उपदेश को सुनने से । दरबार में बैठकर साधना करने से । मन शान्त होता है । और कृमश: भजन । सुमिरन । ध्यान में मन लगने लगता है । अर्थात जो अभ्यास साधक को करने को बताया गया है । यदि उसको दरबार में बैठकर करे । तब तो मन लगने लगता है । उसी अभ्यास को चहल पहल वाली जगह में बैठकर करने से । न मन भजन में लगता है । और न ध्यान ही । मन के अन्दर जमता है । पहले पहल अभ्यास के प्रारम्भ में अभ्यासियों को अभ्यास में रस तथा आनन्द कम होता है ।
66  प्रश्न - एक अभ्यासी ने पूछा - मन में यह इच्छा बार बार उठती है कि आन्तरिक चक्रों का जो हाल सन्तों के द्वारा सुना है । उनमें से पहला चक्र भजन ध्यान करते करते कुछ दिन के ही अभ्यास से खुल जाय । तो गुरू में और उनकी बतलाई हुई साधना में प्रेम और प्रतीत बढे । क्या ऐसा हो सकता है ?
उत्तर - प्रथम तो यह अभ्यास बहुत कठिन है । परन्तु यदि श्री सदगुरू देव महाराज की कृपा हो गई । तो यह चक्र खुल सकता है । खुलने के बाद साधक अन्दर में अपनी जगह बनाकर । कुछ दिन भजन सुमिरन का अभ्यास करेगा । और फ़िर वह चाहेगा कि हमारी साधना यानी भजन ध्यान की क्रिया सुचारू रूप से चले । और भजन, ध्यान में दिन प्रतिदिन प्रगाढता 


बढती चली जाय । तथा मालिक के श्री  चरणों में प्रीति बढती जाय । इस तरह वह भजन ध्यान में मन निरन्तर लगाये रहता है । इसी प्रकार से यदि श्री सदगुरू की कृपा से अन्दर में श्री सदगुरू देव जी महाराज का दर्शन बराबर मिलता रहा । तो दर्शन को बराबर करते रहना चाहिये । यह साधक के साधना की पहली कडी है । साधकों, शिष्यों को यह मालूम होना चाहिये कि आन्तरिक चक्रों की झलक दिखाई देना । व अन्दर में पहुंचकर भजन सुमिरन ध्यान की प्रक्रिया जारी करना । कोई साधारण बात नहीं है । फ़िर भी अभ्यास के साथ साथ जब तक सदाचार में पूर्णता न आ जाय । तब तक स्थिरता आना बहुत कठिन है । इसलिये श्री सदगुरू देव महाराज के आगे गिर कर त्राहिमाम त्राहिमाम करते हुए उनसे विनती करें कि मुझ पर दया करें । मुझ जैसे दीनहीन पर कृपा कर । भजन । सुमिरन । ध्यान मन में जमाकर इन चक्रों से आगे बढाने की कृपा करें । ऐसी विनती करते रहने से दया जरूर होती है ।
गुरू की मूरत बसी हिये में । आठ पहर संग रहाये । अस गुरू भक्ति करी जिन पूरी । तिन तिन नाम समाये । स्वाती बूंद जस रटत पपीहा । अस धुन नाम समाये । नाम प्रताप सुरत जब जागी । तब सुरत ऊपर चढ धाये ।
जब साधक नाम का सुमिरन, भजन और ध्यान करेगा । तब गुरू की दया वाली प्रीत जागेगी । तभी सुरत ऊपर की ओर प्रगतिशील होगी । भक्तजन को चाहिये कि नाम को श्वासों के द्वारा पकड कर निरन्तर नाम का भजन, सुमिरन करते रहें । जब नाम का भजन, सुमिरन पक्का हो जायेगा । तब ध्यान भी अच्छी तरह से आने लग जायेगा । इसीलिये श्री सदगुरू स्वरूप का 


ध्यान करने और साथ ही साथ नाम जपने से दोनों का साथ सध जाता है । कहा गया है - सदगुरू शब्द स्वरूप हैं ।
भजन, सुमिरन और ध्यान करने में जो तरीका अपनाया जाता है । उसी को पूरा नहीं समझना चाहिये । बल्कि और भी ज्यादा से ज्यादा तजुर्बा हासिल करने की कोशिश करनी चाहिये । जैसे सत शास्त्रों को सुनना पढना । यानी पुस्तकीय जानकारी के साथ श्री सदगुरू देव जी महाराज से तरह तरह के तरीके की जानकारी करते रहना चाहिये । जिस प्रकार अभ्यास बढता जायेगा । नया नया तजुर्बा होता जायेगा ।
यदि नियमित रूप से भजन, सुमिरन, ध्यान किया जाय । जो धीरे धीरे ऐसा लगने लगेगा कि सदगुरू का स्वरूप धीरे धीरे नजदीक यानी हमारे अन्दर आता जा रहा है । सबसे आवश्यक बात यह है कि श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री चरणों में प्रीति और प्रतीत के साथ अभ्यास करता रहे । श्री स्वामी जी महाराज समझाते थे कि अभ्यास से अभिप्राय यह है कि - आत्म और मन जिनकी ग्रन्थि इस स्थूल यानी पिण्ड शरीर में बंधी हुई है । वह खुलने लगे । आत्मा मन के फ़न्दे से न्यारी हो । और उसकी चाल बृह्माण्ड की ओर हो । तथा चढाई करके सन्तों के देश दयालदेश तक पहुंचे ।
अभ्यास करते समय यानी भजन, सुमिरन व ध्यान करते समय मन को नाम के सुमिरन में एकाग्र करते करते मालिक यानी श्री सदगुरू देव जी महाराज के ही ध्यान में मन को स्थिर करना चाहिये । यदि कुछ देर बाद ख्याल या सुरति कहीं अन्यत्र चली जाय । तो भी उसको खींचकर श्री सदगुरू 


देव के भजन ध्यान में बार बार लगाते रहना चाहिये । ऐसा करने से कृमश: धीरे धीरे मन भजन व ध्यान में लगने लग जायेगा । इसके बाद भी मन न लगे । तो श्री सदगुरू देव महाराज की आरती । वन्दना । गुरू चालीसा थोङा जोर जोर से भाव विभोर होकर गाना चाहिये । ऐसा करने से मन मालिक में लग जायेगा । ऐसा ख्याल रखना चाहिये  कि मन हर वक्त श्री सदगुरू भगवान के प्रेम के रंग में रंगा रहे । प्रभु के ख्याल में डूबा रहे । ऐसा अभ्यास करते हुए मालिक के भजन, ध्यान में मन को सदा लगाते रहना चाहिये । सदा मन के बराबर प्रवाह को संसारी मोह माया की ओर से मोडकर मालिक में बराबर लगाते रहना चाहिये । यानी ख्याल को अन्तर्मुखी बनाये रखना चाहिये । ऐसा करते करते साधक अन्दर में ऊपर की ओर चढाई करने लगते हैं । इस प्रकार का प्रयोग करने से अभ्यास में आनन्द भी आता है । और मन भी लगने लग जाता हैं ।
अभ्यास करते समय भजन, ध्यान में अभ्यासी अपने मन और सुरत को सहसदल कमल पर जमावे । और कुछ देर के लिये अपनी सुरत को भजन, ध्यान या मानसिक पूजा में लगाये रखे । ऐसा करने से मन माया की तरफ़ से मुड जायेगा । और ऊपर की ओर जो चढाई है । उसका रस उसको अवश्य मिलने लग जायेगा । इसी तरह अभ्यास करते करते जब मन भजन, ध्यान में लग जायेगा । तो साधक धीरे धीरे भजन, सुमिरन, ध्यान के आनन्द में विभोर होता हुआ । आकर्षण में खिंचा हुआ । उस स्थान तक पहुंच जायेगा । जहां मालिक का स्थान है ।
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- ये शिष्य जिज्ञासा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।
2-4 श्लोक कण्ठस्थ करने मात्र से क्या कोई साधु हो जाता है ?

गुरुवार, जनवरी 12, 2012

कबीर गुरू की भक्ति बिन बांधा जमपुर जाय


ऊजल पहने कापड़ा । पान  सुपारी खाय । कबीर गुरू की भक्ति बिन । बांधा जमपुर जाय ।
कुल करनी के कारने । ढिग ही रहिगो राम । कुल काकी लाजि है । जब जमकी धूमधाम ।
कुल करनी के कारने । हंसा गया बिगोय । तब कुल काको लाजि है । चाकिर पांव का होय ।
मैं मेरी तू जानि करे । मेरी मूल बिनास । मेरी पग का पैखड़ा   ।  मेरी गल की फांस । 
ज्यों कोरी रेजा बुने  । नीरा आवे  छोर । ऐसा लेखा मीच का । दौरि सके तो दौर । 
इत पर धर उत है धरा । बनिजन आये हाथ । करम करीना बेचि के । उठि करि चालो काट । 
जिसको रहना उतघरा ।    सो क्यों जोड़े मित्र । जैसे पर घर पाहुना  । रहे उठाये चित्त । 
मेरा संगी कोई नहीं । सबे स्वारथी लोय । मन परतीत न ऊपजे । जिय विस्वाय न होय ।
मैं भोंरो तोहि बरजिया । बन बन बास न लेय । अटकेगा कहुं बेल  में  । तड़फ  तड़फ  जिय देय ।
दीन गंवायो दूनि संग । दुनी न चली साथ । पांच कुल्हाड़ी मारिया । मूरख अपने हाथ । 
तू मति जाने बावरे  । मेरा है यह कोय । प्रान पिण्ड सो बंधि रहा  । सो नहिं अपना होय ।
या मन गहि जो थिर रहे  । गहरी धूनी गाड़ि । चलती बिरिया उठि चला ।  हस्ती घोड़ा छाड़ि ।
तन सराय मन पाहरू । मनसा उतरी आय । कोई काहू का है नहीं  । देखा ठोंकि बजाय । 
डर करनी डर परम गुरु  ।  डर पारस डर सार । डरत रहे  सो ऊबरे  । गाफिल खाई मार । 
भय से भक्ति करे  सब । भय से पूजा होय । भय पारस है जीव को । निरभय होय न कोय । 
भय बिन भाव न ऊपजे । भय बिन होय न प्रीति । जब हिरदे से भय गया,। मिटी सकल रस रीति । 
काल चकृ चाकी चले । बहुत दिवस ओ रात । सुगन अगुन दोउ पाटला।  तामें जीव पिसात । 
बारी बारी आपने । चले पियारे मीत । तेरी बारी जीयरा । नियरे आवे  नीत । 
एक दिन ऐसा होयगा । कोय काहु का नांहि । घर की नारी को कहे । तन की नारी जांहि । 
बैल गढ़न्ता नर । चूका सींग रू पूँछ । एकहिं गुरु के ज्ञान बिनु  । धिक दाढ़ी धिक मूंछ ।

एक गुरु के नाम बिन जम मारेंगे रोज ।

ऊँचा महल चुनाइया ।  सुबरन कली ढुलाय । वे मन्दिर खाले पड़े ।  रहे मसाना जाय । 
ऊँचा मन्दिर मेड़िया ।  चला कली ढुलाय । एकहि गुरु के नाम बिन ।  जदि तदि परलय जाय । 
ऊँचा दीसे धौहरा ।  भागे चीती पोल । एक गुरु के नाम बिन ।  जम मारेंगे रोज । 
पाव पलक तो दूर है ।  मो पे कहा न जाय । ना जानो क्या होयगा ।  पाव के चौथे भाय । 
मौत बिसारी बाहिरा ।  अचरज कीया कौन । मन माटी में मिल गया ।  ज्यों आटा में लौन । 
घर रखवाला बाहिरा ।  चिड़िया खाई खेत । आधा परवा ऊबरे ।  चेति सके तो चेत । 
हाड़ जले लकड़ी जले ।  जले जलवान हार । अजहुँ झोला बहुत है ।  घर आवे तब जान । 
पकी हुई खेती देख के ।  गरब किया किसान । अजहुं झोला बहुत है ।  घर आवे तब जान । 
पाँच तत्व का पूतरा ।  मानुष धरिया नाम । दिना चार के कारने ।  फिर फिर रोके ठाम । 
कहा चुनावे मेड़िया ।  लम्बी भीत उसारि । घर तो साढ़े तीन हाथ ।  घना तो पौने चारि । 
यह तन काचा कुंभ है ।  लिया फिरे थे साथ । टपका लागा फुटि गया ।  कछु न आया हाथ । 
कहा किया हम आयके ।  कहा करेंगे जाय । इत के भये न ऊत के ।  चाले मूल गंवाय । 
कुल खोये कुल ऊबरे । कुल राखे कुल जाय । राम निकुल कुल भेटिया  । सब कुल गया बिलाय ।
दुनिया के धोखे मुआ ।  चला कुटुम की कानि । तब कुल की क्या लाज है   ।जब ले धरा मसानि ।
दुनिया सेती दोसती । मुआ  होत भजन में भंग । एका एकी राम सों ।  कै साधुन के संग ।
यह तन काचा कुंभ है  । यही लिया रहिवास । कबिरा नैन निहारिया । नहिं जीवन की आस । 
यह तन काचा कुंभ हे । चोट चहू दिस खाय । एकहि गुरु के नाम बिन । जदि तदि परलय जाय । 
जंगल ढेरी राख की  ।   उपरि उपरि हरियाय । ते भी होते मानवी  ।  करते रंग रलियाय । 
मलमल खासा पहिनते ।  खाते नागर पान । टेढ़ा होकर चलते   ।    करते बहुत गुमान । 
महलन माही पौढ़ते  । परिमल अंग लगाय । ते सपने दीसे नहीं  ।   देखत गये बिलाय । 

सोमवार, जनवरी 02, 2012

श्री महाराज जी की अमृतवाणी - 6

जय गुरुदेव जी की । नमस्कार राजीव जी । जब गुरु जी और ओमदत्त बाबा मेरे घर आये थे । तो जब मदन जी । मिन्टू जी और उनके 2 और फ़्रेण्डस महाराज जी से सतसंग सुन रहे थे । और मिन्टू के ब्रदर गुरु जी से तर्क कर रहे थे । तो हमने रिकार्डिंग कर ली थी । कहीं कहीं पर आवाज क्लियर नहीं है । आप चैक कर लेना । और जो मैटर पोस्ट करने योग्य हो । वो ब्लाग पर पोस्ट कर देना ।
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श्री महाराज जी की अमृतवाणी - 5

जय गुरुदेव जी की । नमस्कार राजीव जी । जब गुरु जी और ओमदत्त बाबा मेरे घर आये थे । तो जब मदन जी । मिन्टू जी और उनके 2 और फ़्रेण्डस महाराज जी से सतसंग सुन रहे थे । और मिन्टू के ब्रदर गुरु जी से तर्क कर रहे थे । तो हमने रिकार्डिंग कर ली थी । कहीं कहीं पर आवाज क्लियर नहीं है । आप चैक कर लेना । और जो मैटर पोस्ट करने योग्य हो । वो ब्लाग पर पोस्ट कर देना
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श्री महाराज जी की अमृतवाणी - 4

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रविवार, जनवरी 01, 2012

महाराज जी की अमृतवाणी - 3

जय गुरुदेव जी की । नमस्कार राजीव जी । जब गुरु जी और ओमदत्त बाबा मेरे घर आये थे । तो जब मदन जी । मिन्टू जी और उनके 2 और फ़्रेण्डस महाराज जी से सतसंग सुन रहे थे । और मिन्टू के ब्रदर गुरु जी से तर्क कर रहे थे । तो हमने रिकार्डिंग कर ली थी । कहीं कहीं पर आवाज क्लियर नहीं है । आप चैक कर लेना । और जो मैटर पोस्ट करने योग्य हो । वो ब्लाग पर पोस्ट कर देना
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महाराज जी की अमृतवाणी - 2

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महाराज जी की अमृतवाणी - 1

जय गुरुदेव जी की । नमस्कार राजीव जी । जब गुरु जी और ओमदत्त बाबा मेरे घर आये थे । तो जब मदन जी । मिन्टू जी और उनके 2 और फ़्रेण्डस महाराज जी से सतसंग सुन रहे थे । और मिन्टू के ब्रदर गुरु जी से तर्क कर रहे थे । तो हमने रिकार्डिंग कर ली थी । कहीं कहीं पर आवाज क्लियर नहीं है । आप चैक कर लेना । और जो मैटर पोस्ट करने योग्य हो । वो ब्लाग पर पोस्ट कर देना ।
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