मंगलवार, नवंबर 15, 2011

अष्टावकृ गीतावाणी ध्वनि स्वरूप - 6


अष्टावक्र उवाच - यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान । आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति । 15-1
 अष्टावक्र बोले - सात्विक बुद्धि से । युक्त मनुष्य । साधारण प्रकार के उपदेश से भी कृतकृत्य ( मुक्त ) हो जाता है । परन्तु ऐसा न होने पर । आजीवन जिज्ञासु होने पर भी । परबृह्म का । यथार्थ ज्ञान नहीं होता है । 1 
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः । एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु । 15-2 
विषयों से उदासीन होना । मोक्ष है । और विषयों में रस लेना । बंधन है । ऐसा जानकर । तुम्हारी जैसी इच्छा हो । वैसा ही करो । 2 
वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसं । करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षभिः । 15-3
वाणी । बुद्धि । और कर्मों से । महान कार्य करने वाले । मनुष्यों को तत्त्व ज्ञान शांत । स्तब्ध । और कर्म न करने वाला । बना देता है । अतः सुख की इच्छा रखने वाले । इसका त्याग कर देते हैं । 3 
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान । चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर । 15-4 
न तुम शरीर हो । और न यह शरीर । तुम्हारा है । न ही तुम । भोगने वाले । अथवा करने वाले हो । तुम चैतन्य रूप हो । शाश्वत साक्षी हो । इच्छा रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो । 4  
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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