शनिवार, नवंबर 26, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 43

हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया । वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति । 16-9
रागवान पुरुष । दुःख निवृत्ति की । इच्छा से । संसार को । त्यागना चाहता है ।  राग रहित पुरुष । निश्चय करके । दुःख से मुक्त होकर । संसार के बने रहने पर भी । खेद को नहीं प्राप्त होता है । 9
यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा ।  न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभागसौ । 16-10
जिसको मोक्ष । और देह का भी । अभिमान है । वह न ही । ज्ञानी है । और न ही । योगी है । वह केवल दुःख का भागी है । 10
हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा । तथापि न तव स्वाथ्यं सर्वविस्मरणादृते । 16-11
अगर तुम्हारा उपदेशक ( गुरु ) शिव । विष्णु अथवा बृह्मा भी हो । तो भी बिना सबके विस्मरण ( त्याग ) के तुम्हें शांति नहीं मिलेगी । 11  
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

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