शनिवार, नवंबर 26, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 44


इदं कृतमिदं नेति द्वंद्वैर्मुक्तं यदा मनः । धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत । 16-5
यह किया गया है । यह नहीं किया गया है । मन जब । ऐसे द्वन्द से । मुक्त हो जाय । तब वह धर्म । अर्थ । काम । और मोक्ष आदि से । निरपेक्ष ( इच्छा रहित ) होता है । 5
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः । ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान । 16-6
बिषय का द्वेषी । विरक्त है । बिषय का लोभी । रागी है । ग्रहण और त्याग से रहित पुरुष । न ही त्यागी है । और न ही राग वान है । 6
हेयोपादेयता तावत्संसारविटपांकुरः । स्पृहा जीवति यावद वै निर्विचारदशास्पदम । 16-7
जब तक तृष्णा । जब तक अविवेक दशा की स्थिति है । तृष्णा युक्त पुरुष । तब तक जीता है । त्याज्य और ग्राह्य भाव । संसार रुपी वृक्ष का अंकुर है । 7
प्रवृत्तौ जायते रागो निर्वृत्तौ द्वेष एव हि । निर्द्वन्द्वो बालवद धीमान एवमेव व्यवस्थितः । 16-8
प्रवृत्ति में राग होता है । निवृत्ति में द्वेष होता है । इसीलिए बुद्धिमान पुरुष । द्वन्द रहित होकर । जैसे है । उसी भाव में स्थित रहते हैं । 8
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

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