गुरुवार, नवंबर 17, 2011

तुम क्या त्यागना चाहते हो - अष्टावक्र गीता अध्याय - 5

अष्टावक्र उवाच - न ते संगोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि । संघातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज । 5-1
अष्टावक्र बोले - तुम्हारा । किसी से भी । संयोग नहीं है । तुम शुद्ध हो । तुम क्या । त्यागना चाहते हो । इस ( अवास्तविक ) सम्मिलन को । समाप्त करके । बृह्म से । योग ( एकरूपता ) को । प्राप्त करो । 1
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः । इति ज्ञात्वैकमात्मानं एवमेव लयं व्रज । 5-2
जिस प्रकार । समुद्र से । बुलबुले । उत्पन्न होते हैं । उसी प्रकार । विश्व । एक आत्मा से ही । उत्पन्न होता है । यह जानकर । बृह्म से । योग ( एकरूपता ) को । प्राप्त करो । 2
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद् विश्वं नास्त्यमले त्वयि । रज्जुसर्प इव व्यक्तं एवमेव लयं व्रज । 5-3
यद्यपि । यह विश्व । आँखों से । दिखाई देता है । परन्तु । अवास्तविक है । विशुद्ध । तुममें । इस विश्व का । अस्तित्व । उसी प्रकार । नहीं है । जिस प्रकार । कल्पित सर्प का । रस्सी में । यह जानकर । बृह्म से योग ( एकरूपता ) को । प्राप्त करो । 3
समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः । समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज । 5-4
स्वयं को । सुख और दुःख में । समान । पूर्ण । आशा । और निराशा में । समान । जीवन और मृत्यु में । समान । सत्य जानकर । बृह्म से योग ( एकरूपता ) को । प्राप्त करो । 4

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