मंगलवार, नवंबर 15, 2011

अष्टावकृ गीतावाणी ध्वनि स्वरूप - 1


जनक उवाच - अकिंचनभवं स्वास्थं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम । त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम । 13-1
जनक बोले - अकिंचन ( कुछ अपना न ) होने की सहजता केवल कौपीन पहनने पर भी मुश्किल से प्राप्त होती है । अतः त्याग और संग्रह की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 1
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते । मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम । 13-2
शारीरिक दुःख भी कहाँ ( अर्थात नहीं ) हैं । वाणी के दुःख भी कहाँ हैं । वहाँ मन भी कहाँ है । सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 2
कृतं किमपि नैव स्याद इति संचिन्त्य तत्त्वतः । यदा यत्कर्तुमायाति तत कृत्वासे यथासुखम । 13-3
किये हुए किसी भी कार्य का वस्तुतः कोई अस्तित्व नहीं है । ऐसा तत्त्व पूर्वक विचार करके जब जो भी कर्त्तव्य है । उसको करते हुए सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 3
कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावा देहस्थयोगिनः ।  संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम । 13-4
शरीर भाव में स्थित योगियों के लिए कर्म और अकर्म रूपी बंधनकारी भाव होते हैं । पर संयोग और वियोग की प्रवृत्तियों को छोड़कर । सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 4
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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