मंगलवार, नवंबर 15, 2011

अष्टावकृ गीतावाणी ध्वनि स्वरूप - 2


जनक उवाच -  प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाद भावभावनः । निद्रितो बोधित इव क्षीणसंस्मरणो हि सः । 14-1
जनक बोले -  जो स्वभाव से ही विचार शून्य है । और शायद ही कभी कोई इच्छा करता है । वह पूर्व स्मृतियों से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है । जैसे कि नींद से जागा हुआ व्यक्ति अपने सपनों से । 1
 क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः । क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा । 14-2
 जब मैं । कोई इच्छा नहीं करता । तब मुझे धन । मित्रों । विषयों । शास्त्रों और विज्ञान से क्या प्रयोजन है । 2
 विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे । नैराश्ये बंधमोक्षे च न चिंता मुक्तये मम । 14-3
 साक्षी पुरुष रूपी । परमात्मा या ईश्वर को । जानकर मैं बंधन और मोक्ष से । निरपेक्ष हो गया हूँ । और मुझे मोक्ष की चिंता भी नहीं है । 3
अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः । भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते । 14-4
आतंरिक इच्छाओं से रहित । बाह्य रूप में चिंता रहित । आचरण वाले । प्रायः मत्त पुरुष जैसे ही दिखने वाले प्रकाशित पुरुष अपने जैसे प्रकाशित पुरुषों द्वारा ही पहचाने जा सकते हैं । 4
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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