मंगलवार, नवंबर 15, 2011

अष्टावकृ गीतावाणी ध्वनि स्वरूप - 4


देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः । क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः । 15-10 
यह शरीर । सृष्टि के अंत तक रहे । अथवा । आज ही । नाश को प्राप्त हो जाये । तुम तो चैतन्य स्वरुप हो ।  इससे तुम्हारी क्या हानि या लाभ है । 10  
त्वय्यनंतमहांभोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः । 15-11 
अनंत महासमुद्र रूप तुम में । लहर रूप । यह विश्व । स्वभाव से ही । उदय और अस्त । को प्राप्त होता है । इसमें तुम्हारी । क्या वृद्धि या क्षति है । 11 
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना । 15-12 
हे प्रिय ! तुम केवल चैतन्य रूप हो । और यह विश्व । तुमसे अलग नहीं है । अतः किसी की किसी से । श्रेष्ठता या निम्नता । की कल्पना । किस प्रकार की जा सकती है । 12
 एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि । कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च । 15-13 
इस अव्यय । शांत । चैतन्य । निर्मल आकाश में । तुम अकेले ही हो । अतः तुममें जन्म । कर्म और अहंकार की कल्पना किस प्रकार की जा सकती है । 13 
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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