मंगलवार, नवंबर 15, 2011

अष्टावकृ गीतावाणी ध्वनि स्वरूप - 3


यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे । किं पृथक भासते स्वर्णात कटकांगदनूपुरम । 15-14 
तुम एक होते हुए भी । अनेक रूप में । प्रतिबिंबित होकर । दिखाई देते हो । क्या स्वर्ण कंगन । बाज़ूबन्द और पायल से अलग दिखाई देता है । 14
अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति संत्यज । सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव । 15-15 
यह मैं हूँ । और यह मैं नहीं हूँ । इस प्रकार के भेद को त्याग दो । सब कुछ आत्मस्वरूप तुम ही हो । ऐसा निश्चय करके । और कोई संकल्प न करते हुए । सुखी हो जाओ । 15 
तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः । त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन । 15-16 
अज्ञानवश तुम ही । यह विश्व हो । पर ज्ञान दृष्टि से । देखने पर । केवल एक तुम ही हो । तुमसे अलग कोई । दूसरा संसारी । या असंसारी । किसी भी प्रकार से नहीं है । 16 
भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति । 15-17 
यह विश्व केवल भृम ( स्वप्न की तरह असत्य ) है । और कुछ भी नहीं । ऐसा निश्चय करो । इच्छा और चेष्टा रहित हुए । बिना कोई भी । शांति को प्राप्त नहीं होता है । 17
एक एव भवांभोधावासीदस्ति भविष्यति । न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृत्यकृत्यः सुखं चर । 15-18 
एक ही भवसागर ( सत्य ) था । है । और रहेगा । तुममें न मोक्ष है । और न बंधन । आप्त काम होकर सुख से विचरण करो । 18 
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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