मंगलवार, नवंबर 15, 2011

अष्टावकृ गीतावाणी ध्वनि स्वरूप - 5


रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन । निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर । 15-5 
राग ( प्रियता ) और द्वेष ( अप्रियता ) मन के धर्म हैं । और तुम किसी भी प्रकार से मन नहीं हो ।  तुम कामना रहित हो । ज्ञान स्वरुप हो । विकार रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो । 5
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव । 15-6 
समस्त प्राणियों को । स्वयं में । और स्वयं को । सभी प्राणियों में । स्थित जानकर । अहंकार और आसक्ति से । रहित होकर । तुम सुखी हो जाओ । 6 
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे । तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव । 15-7 
इस विश्व की उत्पत्ति । तुमसे । उसी प्रकार होती है । जैसे कि समुद्र से । लहरों की । इसमें संदेह नहीं है । तुम चैतन्य स्वरुप हो । अतः चिंता रहित हो जाओ । 7  
श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोऽहं कुरुष्व भोः । ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः । 15-8 
हे प्रिय ! इस अनुभव पर । निष्ठा रखो । इस पर । श्रद्धा रखो । इस अनुभव की सत्यता के । सम्बन्ध में मोहित मत हो । तुम ज्ञान स्वरुप हो । तुम प्रकृति से परे । और आत्म स्वरुप भगवान हो । 8  
गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गंता नागंता किमेनमनुशोचसि । 15-9 
गुणों से निर्मित । यह शरीर स्थिति । जन्म और मरण को प्राप्त होता है । आत्मा न आती है । और न ही जाती है । अतः तुम क्यों शोक करते हो । 9
इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है ।



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