शनिवार, अगस्त 13, 2011

मैं ही सभी जीवों का आदि मध्य और अन्त हूँ - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 10

भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया । 10-1
श्रीकृष्ण बोले - फिर से । हे महाबाहो ! तुम मेरे परम वचनों को सुनो । क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो । इसलिये मैं तुम्हारे हित के लिये तुम्हें बताता हूँ ।
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः । 10-2
न मेरे आदि ( आरम्भ ) को देवता लोग जानते हैं । और न ही महान ऋषि जन । क्योंकि मैं ही सभी देवताओं का । और महर्षियों का आदि हूँ ।
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम । असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते । 10-3
जो मुझे अजन्मा ( जन्म हीन ) और अनादि ( जिसका कोई आरम्भ न हो ) और इस संसार का महान ईश्वर ( स्वामी ) जानता है । वह मूर्खता रहित मनुष्य । इस मृत्यु संसार में । सभी पापों से मुक्त हो जाता है ।
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च । 10-4
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः । 10-5
बुद्धि । ज्ञान । मोहित होने का अभाव । क्षमा । सत्य । इन्द्रियों पर संयम । मन की शमता ( संयम ) सुख । दुख । होना और न होना । भय और अभय । प्राणियों की हिंसा न करना ( अहिंसा ) 1 सा रहना । 1 सा देखना ( समता ) संतोष । तप । दान । यश । अपयश । प्राणियों के ये सभी अलग अलग भाव मुझसे ही होते हैं ।
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मदभावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः । 10-6
पूर्वकाल में उत्पन्न हुये सप्त ( 7 ) महर्षि । 4 बृह्म कुमार । और मनु । ये सब मेरे द्वारा ही मन से ( योग द्वारा ) उत्पन्न हुये हैं । और उनसे ही इस लोक में यह प्रजा हुई है ।
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः । 10-7
मेरी इस विभूति ( संसार के जन्मकर्ता ) और योग ऐश्वर्य को जो सार तक जानता है । वह अचल ( भक्ति ) योग में स्थिर हो जाता है । इसमें कोई शक नहीं ।
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः । 10-8
मैं ही सब कुछ का आरम्भ हूँ । मुझसे ही सब कुछ चलता है । यह मानकर बुद्धिमान लोग पूर्ण भाव से मुझे भजते हैं ।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च । 10-9
मुझमें ही अपने चित्त को बसाये । मुझमें ही अपने प्राणों को संजोये । परस्पर 1 दूसरे को मेरा बोध कराते हुये । और मेरी बातें करते हुये । मेरे भक्त सदा संतुष्ट रहते हैं । और मुझमें ही रमते हैं ।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते । 10-10
ऐसे भक्त जो सदा भक्ति भाव से भरे मुझे प्रीति पूर्ण ढंग से भजते हैं । उन्हें मैं वह बुद्धि योग ( सार युक्त बुद्धि ) प्रदान करता हूँ । जिसके द्वारा वे मुझे प्राप्त करते हैं ।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता । 10-11
उन पर अपनी कृपा करने के लिये । मैं उनके अन्तकरण में स्थित होकर । अज्ञान से उत्पन्न हुये उनके अँधकार को । ज्ञान रूपी दीपक जलाकर नष्ट कर देता हूँ ।
परं बृह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम । 10-12
अर्जुन बोला -  आप ही परम बृह्म हैं । आप ही परम धाम हैं । आप ही परम पवित्र हैं । आप ही दिव्य शाश्वत पुरुष हैं । आप ही हे विभु आदि देव हैं । अजन्मा हैं ।
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव बृवीषि मे । 10-13
सभी ऋषि । देवर्षि नारद । असित । व्याल । व्यास जी । आपको ऐसे ही बताते हैं । यहाँ तक कि स्वयँ आपने भी मुझसे यही कहा है ।
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः । 10-14
हे केशव ! आपने मुझे जो कुछ भी बताया । उस सबको मैं सत्य मानता हूँ । हे भगवन ! आपके व्यक्त होने को न देवता जानते हैं । और न ही दानव ।
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते । 10-15
स्वयं आप ही अपने आपको जानते हैं । हे पुरुषोत्तम ! हे भूत भावन ( जीवों के जन्मदाता ) । हे भूतेश ! ( जीवों के ईश ) । हे देवों के देव ! हे जगतपति !
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि । 10-16
आप जिन जिन विभूतियों से इस संसार में व्याप्त होकर विराजमान हैं । मुझे पूरी तरह ( अशेष ) अपनी उन दिव्य आत्म विभूतियों का वर्णन कीजिये ( आप ही करने में समर्थ हैं ) ।
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया । 10-17
हे योगी ! मैं सदा आपका परिचिन्तन करता ( आपके बारे में सोचता ) हुआ किस प्रकार आपको जानूं ? ( अर्थात किस प्रकार मैं आपका चिन्तन करूँ ? )। हे भगवन ! मैं आपके किन किन भावों में आपका चिन्तन करूँ ।
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम । 10-18
हे जनार्दन ! आप आपनी योग विभूतियों के विस्तार को फिर से मुझे बताइये । क्योंकि आपके वचनों रुपी
इस अमृत का पान करते ( सुनते ) अभी मैं तृप्त नहीं हुआ हूँ ।
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्रधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे । 10-19
श्रीकृष्ण बोले - मैं तुम्हें अपनी प्रधान प्रधान दिव्य आत्म विभूतियों के बारे में बताता हूँ । क्योंकि हे कुरु श्रेष्ठ ! मेरे विस्तार का कोई अन्त नहीं है ।
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च । 10-20
मैं आत्मा हूँ । हे गुडाकेश ! सभी जीवों के अन्तकरण में स्थित । मैं ही सभी जीवों का आदि ( जन्म ) मध्य और अन्त भी हूँ ।
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी । 10-21
आदित्यों ( अदिति के पुत्रों ) में मैं विष्णु हूँ । और ज्योतियों में किरणों युक्त सूर्य हूँ । मरुतों ( 49 मरुत नाम के देवताओं ) में से मै मरीचि हूँ । और नक्षत्रों में शशि ( चन्द्र ) ।
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना । 10-22
वेदों में मैं साम वेद हूँ । देवताओं में इन्द्र । इन्द्रियों में मैं मन हूँ । और जीवों में चेतना ।
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम । वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम । 10-23
रुद्रों में मैं शंकर ( शिव जी ) हूँ । और यक्ष एवं राक्षसों में कुबेर हूँ । वसुओं में मैं अग्नि ( पावक ) हूँ । और शिखर वाले पर्वतों में मैं मेरु हूँ ।
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः । 10-24
हे पार्थ ! तुम मुझे पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति जानो । सेनापतियों में मुझे स्कँध जानो । और जलाशयों में
सागर ।
महर्षिणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः । 10-25
महर्षियों में मैं भृगु हूँ । शब्दों में मैं 1 ही अक्षर ॐ हूँ । यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ । और न हिलने वालों में हिमालय ।
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः । 10-26
सभी वृक्षों में मैं अश्वत्थ हूँ । और देव ऋर्षियों में नारद । गन्धर्वों में मैं चित्ररथ हूँ । और सिद्धों में भगवान कपिल मुनि ।
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोदभवम । ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम । 10-27
सभी घोड़ों में से मुझे तुम अमृत के लिये किये सागर मंथन से उत्पन्न उच्चैश्रवा ही समझो । हाथियों का राजा ऐरावत समझो । और मनुष्यों में मनुष्यों का राजा समझो ।
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः । 10-28
शस्त्रों में मैं वज्र हूँ । गायों में कामधुक । प्रजा की बढौती करने वालों में कन्दर्प ( कामदेव ) और सर्पों में मैं वासुकि हूँ ।
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम । 10-29
नागों में मैं अनन्त ( शेषनाग ) हूँ । और जल के देवताओं में वरुण । पितरों में अर्यामा हूँ । और नियंत्रित करने वालों में यम देव ।
प्रहलादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम । मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम । 10-30
दैत्यों में मैं भक्त प्रहलाद हूँ । परिवर्तन शीलों में मैं समय हूँ । हिरणों में मैं उनका इन्द्र अर्थात शेर हूँ । और
पक्षियों में वैनतेय ( गरुड ) ।
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम । झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाहनवी । 10-31
पवित्र करने वालों में मैं । पवन ( हवा ) हूँ । और शस्त्र धारण करने वालों में । राम । मछलियों में मैं । मकर हूँ । और नदियों में । जाहनवी ( गँगा ) ।
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम । 10-32
सृष्टि का आदि । अन्त । और मध्य भी । मैं ही हूँ । हे अर्जुन ! सभी विद्याओं में से । अध्यात्म विद्या । मैं हूँ । और वाद विवाद करने वालों के वाद में । तर्क मैं हूँ ।
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः । 10-33
अक्षरों में अ मैं हूँ । मैं ही अन्तहीन ( अक्षय ) काल ( समय ) हूँ । मैं ही धाता हूँ ( पालन करने वाला ) मैं ही विश्व रूप ( हर ओर स्थित हूँ ) ।
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुदभवश्च भविष्यताम  । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा । 10-34
सब कुछ हर लेने वाली मृत्यु भी । मैं हूँ । और भविष्य में उत्पन्न होने वाले जीवों की उत्पत्ति भी । मैं ही हूँ ।
नारियों में कीर्ति ( यश ) श्री ( धन संपत्ति सत्त्व ) वाक शक्ति ( बोलने की शक्ति ) स्मृति ( यादाश्त )  मेधा ( बुद्धि ) धृति ( स्थिरता ) और क्षमा मैं हूँ ।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः । 10-35
गाये जाने वाली श्रुतियों ( सामों ) में मैं । बृहतसाम हूँ । और वैदिक छन्दों में । गायत्री । महीनों में मैं । मार्गशीर्ष हूँ । और ऋतुओं में । कुसुमाकर ( फूलों को करने वाली अर्थात वसन्त )।
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम । 10-36
छल करने वालों का जुआ । मैं हूँ । और तेजस्वियों का तेज । मैं हूँ । मैं ही । विजय ( जीत ) हूँ । मैं ही । सही निश्चय ( सही मार्ग ) हूँ । मैं ही । सात्विकों का सत्व हूँ ।
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः । 10-37
वृष्णियों में मैं । वासुदेव हूँ । और पाण्डवों में । धनंजय ( अर्जुन ) । मुनियों में मैं । भगवान व्यास मुनि हूँ । और सिद्ध कवियों में मैं । उशना कवि ( शुक्राचार्य ) हूँ ।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम । 10-38
दमन ( लागू ) करने वालों में दण्ड नीति । मैं हूँ । और विजय की इच्छा रखने वालों में न्याय । ( नीति ) मैं हूँ । गोपनीय बातों में मौनता । मैं हूँ । और ज्ञानियों का ज्ञान । मैं हूँ ।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम । 10-39
जितने भी जीव हैं । हे अर्जुन ! उन सबका बीज । मैं हूँ । ऐसा कोई भी चर अचर ( चलने या न चलने वाला ) जीव नहीं है । जो मेरे बिना हो ।
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया । 10-40
मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है । हे परन्तप ! मैंने अपनी इन विभूतियों का विस्तार तुम्हें केवल कुछ उदाहरण देकर ही बताया है ।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम । 10-41
जो कुछ भी ( प्राणी । वस्तु आदि ) विभूति मयी है । सत्वशील है । श्री युक्त हैं । अथवा शक्तिमान है । उसे तुम मेरे ही अंश के तेज से उत्पन्न हुआ जानो ।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत । 10-42
और इसके अतिरिक्त । बहुत कुछ जानने की । तुम्हें क्या आवश्यकता है ? हे अर्जुन ! मैंने इस संम्पूर्ण जगत को । अपने 1 अंश मात्र से । प्रवेश करके । स्थित कर रखा है ।

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