शनिवार, अगस्त 13, 2011

लेकिन मुझे प्राप्त कर लेने पर दोबारा जन्म नहीं होता - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 8

किं तदबृह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते । 8-1
अर्जुन बोला - हे पुरुषोत्तम ! बृह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? और कर्म क्या होता है ? अधिभूत । किसे कहते हैं ? और अधिदैव । किसे कहा जाता है ?
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः । 8-2
हे मधुसूदन ! इस देह में जो अधियज्ञ है । वह कौन है ? और सदा नियमित चित्त वाले । कैसे मृत्युकाल के समय । उसे जान जाते हैं ?
अक्षरं बृह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोदभवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः । 8-3
श्रीकृष्ण बोले - जिसका क्षर नहीं होता । वह बृह्म है । जीवों के परम स्वभाव को । ही अध्यात्म कहा जाता है । जीवों की जिससे । उत्पत्ति होती है । उसे कर्म । कहा जाता है ।
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर । 8-4
इस देह के क्षर भाव को । अधिभूत कहा जाता है । और पुरूष अर्थात आत्मा को । अधिदैव कहा जाता है । इस देह में । मैं अधियज्ञ हूँ । देह धारण करने वालों में सबसे श्रेष्ठ ।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम । यः प्रयाति स मदभावं याति नास्त्यत्र संशयः । 8-5
अन्तकाल में । मुझी को याद करते हुये । जो देह से मुक्ति पाता है । वह मेरे ही भाव को । प्राप्त होता है । इसमें कोई संशय नहीं ।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तदभावभावितः । 8-6
प्राणी जो भी स्मरण करते हुये । अपनी देह त्यागता है । वह उसी को प्राप्त करता है । हे कौन्तेय ! सदा उन्हीं भावों में रहने के कारण ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम । 8-7
इसलिये हर समय । मुझे ही याद करते हुये । तुम युद्ध करो । अपने मन और बुद्धि को । मुझे ही अर्पित करने से । तुम मुझमें ही रहोगे । इसमें कोई संशय नहीं ।
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन । 8-8
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात । 8-9
हे पार्थ ! अभ्यास द्वारा । चित्त को योग युक्त कर । और अन्य किसी भी विषय का । चिन्तन न करते हुये । उन पुरातन कवि । सबके अनुशासक । सूक्ष्म से भी सूक्ष्म । सबके धाता । अचिन्त्य रूप । सूर्य के प्रकार प्रकाशमयी । अंधकार से परे । उन ईश्वर का ही चिन्तन करते हुये । उस दिव्य परम पुरुष को ही प्राप्त करोगे ।
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम । 8-10
इस देह को त्यागते समय । मन को योग बल से अचल कर । और और भक्ति भाव से युक्त हो । भ्रुवों के
मध्य में अपने प्राणों को टिकाकर जो प्राण त्यागता है । वह उस दिव्य परम पुरुष को प्राप्त करता है ।
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो बृह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये । 8-11
जिसे वेद को जानने वाले अक्षर कहते हैं । और जिसमें साधक राग मुक्त हो जाने पर प्रवेश करते हैं ।
जिसकी प्राप्ति की इच्छा से बृह्मचारी बृह्मचर्य का पालन करते हैं । तुम्हें मैं उस पद के बारे में बताता हूँ ।
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम । 8-12
ओमित्येकाक्षरं बृह्म व्याहरन्मामनुस्मरन । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम । 8-13
अपने सभी द्वारों ( अर्थात इन्द्रियों ) को संयमशील कर । मन और हृदय को निरोध कर ( विषयों से निकाल कर ) प्राणों को अपने मष्तिष्क में स्थित कर । इस प्रकार योग को धारण करते हु्ये । ॐ से अक्षर बृह्म को संबोधित करते हुये । और मेरा अनु स्मरण करते हुऐ । जो अपनी देह को त्यागता है । वह परम गति को प्राप्त करता है ।
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः । 8-14
अनन्य चित्त से जो मुझे सदा याद करता है । हे पार्थ ! उस नित्य युक्त योगी के लिये मुझे प्राप्त करना आसान है ।
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः । 8-15
मुझे प्राप्त कर लेने पर महात्माओं को फिर से दुख का घर और मृत्युरूप अगला जन्म नहीं लेना पड़ता । क्योंकि वे परम सिद्धि को प्राप्त कर चुके हैं ।
आबृह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते । 8-16
बृह्म से नीचे जितने भी लोक हैं । उनमें से किसी को भी प्राप्त करने पर जीव को वापिस लौटना पड़ता है ( मृत्यु होती है )  लेकिन मुझे प्राप्त कर लेने पर । हे कौन्तेय ! फिर दोबारा जन्म नहीं होता ।
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यदबृह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः । 8-17
जो जानते हैं कि सहस्र ( 1000 ) युग बीत जाने पर बृह्म का दिन होता है । और सहस्र युगों के अन्त पर ही
रात होती है । वे लोग दिन और रात को जानते हैं ।
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके । 8-18
दिन के आगम पर अव्यक्त से सभी उत्पन्न होकर व्यक्त ( दिखते हैं ) होते हैं । और रात के आने पर प्रलय को प्राप्त हो । जिसे अव्यक्त कहा जाता है । उसी में समा जाते हैं ।
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे । 8-19
हे पार्थ ! इस प्रकार यह समस्त जीव दिन आने पर बार बार उत्पन्न होते हैं । और रात होने पर बार बार
वशहीन ही प्रलय को प्राप्त होते हैं ।
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति । 8-20
इन व्यक्त और अव्यक्त जीवों से परे । 1 और अव्यक्त सनातन पुरुष है । जो सभी जीवों का अन्त होने पर भी नष्ट नहीं होता ।
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम । 8-21
जिसे अव्यक्त और अक्षर कहा जाता है । और जिसे परम गति बताया जाता है । जिसे प्राप्त करने पर कोई फिर से नहीं लौटता । वही मेरा परम स्थान है ।
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम । 8-22
हे पार्थ ! उस परम पुरुष को । जिसमें यह सभी जीव स्थित हैं । और जिसमें यह सब कुछ ही बसा हुआ है । तुम अनन्य भक्ति से पा सकते हो ।
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ । 8-23
हे भरतर्षभ ! अब मैं तुम्हें वह समय बताता हूँ । जिसमें शरीर त्यागते हुऐ योगी लौटकर नहीं आते । और जिसमें वे लौटकर आते हैं ।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम । तत्र प्रयाता गच्छन्ति बृह्म बृह्मविदो जनाः । 8-24
रोशनी में । अग्नि की ज्योति के समीप । दिन के समय । या सूर्य के उत्तर में होने वाले 6 महीने ( गरमी ) उसमें जाने वाले । बृह्म को जानने वाले । बृह्म को प्राप्त करते हैं ।
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते । 8-25
धूयें । रात । अंधकार । और सूर्य के दक्षिण में होने वाले 6 महीने ( सर्दी )  उसमें योगी चन्द्र की ज्योति को प्राप्त कर पुनः लौटते हैं ।
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः । 8-26
इस जगत में सफेद और काला । ये 2 शाश्वत पथ माने जाते हैं । 1 पर चलने वाले । फिर लौटकर नहीं आते । और दूसरे पर चलने वाले फिर लौटकर आते हैं ।
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन । 8-27
हे पार्थ ! ऐसा 1 भी योगी नहीं है । जो इसे जान जाने के बाद फिर कभी मोहित हुआ हो । इसलिये हे अर्जुन ! तुम हर समय योग युक्त बनो ।
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत पुण्यफलं प्रदिष्टम । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम । 8-28
इस सबको जानकर योगी वेदों । यज्ञों । तप । औऱ दान से । जो भी पुण्य फल प्राप्त होते हैं । उन सबसे ऊपर उठकर । पुरातन परम स्थान प्राप्त कर लेता है ।

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