शनिवार, अगस्त 13, 2011

मैं तुम्हें इस परम रहस्य को बताता हूँ - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 9

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात । 9-1
श्रीकृष्ण बोले - मैं तुम्हें । इस परम रहस्य के बारे में । बताता हूँ । क्योंकि तुममें इसके प्रति । कोई वैर वहीं है । इसे ज्ञान और अनुभव सहित । जान लेने पर । तुम अशुभ से । मुक्ति पा लोगे ।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम । 9-2
यह विद्या । सबसे श्रेष्ठ है । सबसे श्रेष्ठ रहस्य है । उत्तम से भी उत्तम । और पवित्र है । सामने ही दिखने वाली है ( टेङी नहीं है ) न्याय और अच्छाई से भरी है । अव्यय है । और आसानी से । इसका पालन किया जा सकता है ।
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि । 9-3
हे परन्तप ! इस धर्म में । जिन पुरुषों की । श्रद्धा नहीं होती । वे मुझे प्राप्त न कर । बारबार । इस मृत्यु संसार में । जन्म लेते हैं ।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः । 9-4
मैं इस संपूर्ण जगत में । अव्यक्त ( जो दिखाई न दे ) मूर्ति रुप से । विराजित हूँ । सभी जीव मुझमें ही । स्थित हैं । मैं उनमें नहीं ।
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः । 9-5
लेकिन फिर भी । ये जीव । मुझमें स्थित नहीं हैं । देखो मेरे योग ऐश्वर्य को । इन जीवों में स्थित न होते हुये भी । मैं इन जीवों का पालन हार । और उत्पत्ति कर्ता हूँ ।
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय । 9-6
जैसे सदा । हर ओर फैले हुये आकाश में । वायु चलती रहती है । उसी प्रकार । सभी जीव । मुझमें स्थित हैं ।
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम । 9-7
हे कौन्तेय ! सभी जीव । कल्प का अन्त हो जाने पर ( 1000 युगों के अन्त पर ) मेरी ही प्रकृति में समा जाते हैं । और फिर । कल्प के आरम्भ पर । मैं उनकी दोबारा रचना करता हूँ ।
प्रकृति स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात । 9-8
इस प्रकार । प्रकृति को अपने वश में कर । पुनः पुनः । इस संपूर्ण जीव समूह की । मैं रचना करता हूँ । जो । इस प्रकृति के । वश में होने के कारण । वशहीन हैं ।
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु । 9-9
यह कर्म । मुझे बांधते नहीं हैं । हे धनंजय ! क्योंकि मैं । इन कर्मों को करते हुये भी । इनसे उदासीन ( जिसे कोई खास मतलब न हो ) और संग रहित । रहता हूँ ।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते । 9-10
मेरी अध्यक्षता के नीचे । यह प्रकृति । इन चर और अचर ( चलने वाले और न चलने वाले ) जीवों को जन्म देती है । इसी से । हे कौन्तेय ! इस जगत का । परिवर्तन चक्र । चलता है ।
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम  । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम । 9-11
इस मानुषी तन का आश्रय लेने पर ( मानव रुप अवतार लेने पर ) जो मूर्ख हैं । वे मुझे नहीं पहचानते । मेरे परम भाव को नहीं जानते कि - मैं इन सभी भूतों का ( संसार और प्राणियों का ) महान ईश्वर हूँ ।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः । 9-12
व्यर्थ आशाओं में बँधे । व्यर्थ कर्मों में लगे । व्यर्थ ज्ञानों से । जिनका चित्त हरा जा चुका है । वे विमोहित करने वाली । राक्षसी और आसुरी प्रकृति का सहारा लेते हैं ।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम । 9-13
लेकिन महात्मा लोग । हे पार्थ ! दैवी प्रकृति का ही । आश्रय लेकर । मुझे ही अव्यय ( विकारहीन ) और इस संसार का । आदि जानकर । अनन्य मन से । मुझे भजते हैं ।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढवृताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते । 9-14
ऐसे भक्त । सदा मेरी प्रशंसा ( कीर्ति ) करते हुये । मेरे सामने नतमस्तक हो । और सदा भक्ति से युक्त हो दृण वृत से मेरी उपासना करते हैं ।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम । 9-15
और दूसरे कुछ लोग । ज्ञान यज्ञ द्वारा । मुझे उपासते हैं । अलग अलग रूपों में । एक ही देखते हुये । और इन बहुत से रुपों को । ईश्वर का विश्वरूप ही । देखते हुये ।
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम । 9-16
मैं क्रतु हूँ । मैं ही यज्ञ हूँ । स्वधा मैं हूँ । मैं ही औषधि हूँ । मन्त्र मैं हूँ । मैं ही घी हूँ । मैं अग्नि हूँ । और यज्ञ में
अर्पित करने का कर्म भी मैं ही हूँ ।
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च । 9-17
मैं इस जगत का पिता हूँ । माता भी । धाता भी । और पितामह ( दादा ) भी । मैं ही वेद्यं ( जिसे जानना चाहिये ) हूँ । पवित्र ॐ हूँ । और ऋग । साम । और यजुर भी मैं ही हूँ ।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम । 9-18
मैं ही गति ( परिणाम ) हूँ । भर्ता ( भरण पोषण करने वाला ) हूँ । प्रभु ( स्वामी ) हूँ । साक्षी हूँ । निवास स्थान हूँ । शरण देने वाला हूँ । और सुहृद ( मित्र अथवा भला चाहने वाला ) हूँ । मैं ही उत्पत्ति हूँ । प्रलय हूँ । आधार ( स्थान ) हूँ । कोष हूँ । मैं ही विकारहीन अव्यय बीज हूँ ।
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन । 9-19
मैं ही भूमि को ( सूर्य रूप से ) तपाता हूँ । और मैं ही जल को सोख कर । वर्षा करता हूँ । मैं अमृत भी हूँ । मृत्यु भी । हे अर्जुन ! और मैं ही सत भी । और असत भी ।
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्टवा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान । 9-20
3 वेदों ( ऋग । साम । यजुर ) के ज्ञाता । सोम ( चन्द्र ) रस का पान करने वाले । क्षीण पाप लोग । स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से । यज्ञों द्वारा मेरा पूजन करते हैं । उन पुण्य कर्मों के फल स्वरूप । वे देवताओं के राजा । इन्द्र के लोक को प्राप्त कर । देवताओं के दिव्य भोगों का भोग करते हैं ।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते । 9-21
वे उस विशाल स्वर्ग लोक को । भोगने के कारण । पुण्य क्षीण होने पर । फिर से । मृत्यु लोक पहुँचते हैं । इस प्रकार कामी ( इच्छाओं से भरे ) लोग । 3 शाखाओं वाले धर्म ( 3 वेदों ) का पालन कर । अपनी इच्छाओं को प्राप्त कर । बारबार आते जाते हैं ।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम । 9-22
किसी और का चिन्तन न कर । अनन्य चित्त से । जो जन । मेरी उपासना करते हैं । उन नित्य अभियुक्त ( सदा मेरी भक्ति से युक्त ) लोगों को । मैं योग और क्षेम ( जो नहीं है । उसकी प्राप्ति । और जो है । उसकी रक्षा  लाभ की प्राप्ति और अलाभ से रक्षा ) प्रदान करता हूँ ।
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम । 9-23
जो ( अन्य देवताओं के ) भक्त । अन्य देवताओं का । श्रद्धा से पूजन करते हैं । वे भी । हे कौन्तेय ! मेरा ही पूजन करते हैं । लेकिन अविधि पूर्ण ढँग से ।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते । 9-24
मैं ही । सभी यज्ञों का भोक्ता ( भोगने वाला ) और प्रभु हूँ । वे मुझे । सार तक नहीं जानते । इसीलिये वे गिर पड़ते हैं ।
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृवृताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम । 9-25
देवताओं ( के अर्चन ) का वृत रखने वाले । देवताओं के पास जाते हैं । पितृ पूजन वाले । पितरों को प्राप्त करते हैं । जीवों का पूजन करने वाले । जीवों को प्राप्त करते हैं । और मेरी भक्ति करने वाले । मुझे ही प्राप्त करते हैं ।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः । 9--26
मेरा भक्त । शुद्ध मन से । मुझे जो भी पत्ता । फूल । फल । अथवा जल । अर्पित करता है । उस भक्ति भरे मन से अर्पित की वस्तु को । मैं भोगता ( स्वीकार करता ) हूँ ।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम । 9-27
हे कौन्तेय ! तुम जो भी करते हो । जो भी खाते हो । जो भी यज्ञ करते हो । जो भी दान करते हो । जो भी तप करते हो । वह सब । मुझे ही अर्पण कर दो ।
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि । 9-28
इस प्रकार । शुभ और अशुभ फलों से । और कर्म बन्धन से । मुक्ति पाकर ।  सन्यास ( त्याग ) और योग युक्त । आत्मा द्वारा विमुक्त हो । तुम मुझे प्राप्त कर लोगे ।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम । 9-29
मेरे लिये । सभी जीव एक से हैं । न मुझे किसी से द्वेष है । और न ही । कोई प्रिय है । लेकिन जो भक्ति भाव से । मुझे भजते हैं । वे मुझमें हैं । और मैं उनमें हूँ ।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः । 9-30
यदि बहुत दुराचारी व्यक्ति भी । अनन्य भाव से । मुझे भजता है । तो उसे । साधु पुरूष ही समझना चाहिये । क्योंकि उसने । उत्तम निर्णय कर लिया है ।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति । 9-31
वह जल्द ही धर्मात्मा ( सदाचार करने वाला ) बन । शाश्वत शान्ति को । प्राप्त कर लेता है । हे कौन्तेय ! तुम एकदम जानो कि मेरे भक्त का । कभी नाश नहीं होता ।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम । 9-32
हे पार्थ ! मेरा ही आश्रय लेकर । वे लोग । जो पाप योनियों से उत्पन्न हुये हैं । और स्त्रियाँ । वैश्य । और शूद्र भी । परम गति को । प्राप्त कर लेते हैं ।
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम । 9-33
फिर पुण्य और भक्तिमान ब्राह्मण । और राज ( क्षत्रिय ) ऋषियों की तो बात ही क्या है । इसलिये इस अनित्य ( अन्तशील ) और असुखी लोक में जन्म लेने पर । मेरी ही भक्ति करो ।
मन्मना भव मदभक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः । 9-34
मुझ ही में । अपने मन को लगाओ । मेरे भक्त बनो । मेरा ही । पूजन करो । मेरे ही सामने । नतमस्तक हो । इस प्रकार युक्त रहते हुये । मेरे ही ओर लगे हुये । तुम मुझे ही प्राप्त करोगे ।

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