शनिवार, अगस्त 13, 2011

मैं संसार का क्षय करने के लिये बढा हुआ काल हूँ - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 11

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम । 11-1
अर्जुन बोला - मुझ पर अनुग्रह कर । आपने यह परम गुह्य । अध्यात्म ज्ञान । जो मुझे बताया । आपके इन वचनों से । मेरा मोह ( अन्धकार ) चला गया है ।
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम । 11-2
हे कमलपत्र नयन ! मैंने आपसे सभी प्राणियों की उत्पत्ति । और अन्त को । विस्तार से सुना है । और हे अव्यय ! आपके महात्मय का वर्णन भी ।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । दृष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम । 11-3
जैसा आपको बताया जाता है । हे परमेश्वर ! आप वैसे ही हैं । हे पुरुषोत्तम ! मैं आपके ईश्वर रुप को देखना चाहता हूँ ।
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया दृष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम । 11-4
हे प्रभो ! यदि आप मानते हैं कि आपके उस रुप को । मेरे द्वारा देख पाना संभव है । तो हे योगेश्वर ! मुझे आप । अपने अव्यय । आत्म स्वरुप के । दर्शन करवा दीजिये ।
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च । 11-5
श्रीकृष्ण बोले - हे पार्थ ! तुम मेरे रुपों का दर्शन करो । सैंकड़ों । हज़ारों । भिन्न भिन्न प्रकार के । दिव्य । भिन्न भिन्न वर्णों और आकृतियों वाले ।
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत । 11-6
हे भारत ! तुम आदित्यों । वसुओं । रुद्रों । अश्विनों । और मरुतों को देखो । और बहुत से पहले कभी न देखे गये आश्चर्यों को भी देखो ।
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद दृष्टुमिच्छसि । 11-7
हे गुडाकेश ! तुम मेरी देह में 1 जगह स्थित । इस संपूर्ण चर अचर जगत को देखो । और भी जो कुछ
तुम्हे देखने की इच्छा हो । वह तुम मेरी इस देह में देख सकते हो ।
न तु मां शक्यसे दृष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम । 11-8
लेकिन तुम मुझे । अपनी इन आँखों से । नहीं देख सकते । इसलिये मैं तुम्हें । दिव्य चक्षु ( तीसरी आँख ) प्रदान करता हूँ । जिससे तुम । मेरे योग ऐश्वर्य का । दर्शन करो ।
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम । 11-9
संजय बोला - यह बोलने के बाद । हे राजन ! महा योगेश्वर हरि ने पार्थ को अपने परम ऐश्वर्यमयी रुप का दर्शन कराया ।
अनेकवक्त्रनयनमनेकादभुतदर्शनम । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम । 11-10
अर्जुन ने देखा - भगवान के अनेक मुख हैं । अनेक नेत्र हैं । अनेक अदभुत दर्शन ( रुप ) हैं । उन्होंने अनेक दिव्य आभूषण पहने हुये हैं । और अनेकों दिव्य आयुध ( शस्त्र ) धारण किये हुये हैं ।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम । 11-11
उन्होंने दिव्य मालायें । और दिव्य वस्त्र । धारण किये हुये हैं । दिव्य गन्धों से लेपित हैं । सर्व ऐश्वर्य मयी वे देव अनन्त रुप हैं । विश्व रुप ( हर ओर स्थित ) हैं ।
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्यादभासस्तस्य महात्मनः । 11-12
यदि आकाश में 1000 ( सहस्र ) सूर्य भी 1 साथ उदय हो जायें । शायद ही वे उन महात्मा के समान प्रकाश मयी हो पायें ।
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा । 11-13
तब पाण्डव ( अर्जुन ) ने उन देवों के देव । भगवान हरि के शरीर में 1 स्थान पर स्थित । अनेक विभागों में बँटे सम्पूर्ण संसार ( कृत्स्न जगत ) को देखा ।
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत । 11-14
तब विस्मय ( आश्चर्य ) पू्र्ण होकर । जिसके रोंगटे खड़े हो गये थे । उस धनंजय ने उन देव को सिर झुकाकर प्रणाम किया । और हाथ जोड़कर बोले ।
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान । बृह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान । 11-15
अर्जुन बोला - हे देव ! मुझे आपके देह में सभी देवता । और अन्य समस्त जीव समूह । कमल आसन पर स्थित बृह्मा । ईश्वर । सभी ऋषि । और दिव्य सर्प दिख रहे हैं ।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर  विश्वरूप । 11-16
अनेक बाँहें । अनेक पेट । अनेक मुख । अनेक नेत्र । हे देव ! मैं आपको हर जगह देख रहा हूँ । हे अनन्त रुप । ना मुझे आपका अन्त । न मध्य । और न ही आदि ( शुरुआत ) दिख रहा । हे विश्वेश्वर ! ( विश्व के ईश्वर ) हे विश्व रुप ( विश्व का रुप धारण किये हुये ) ।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तान लार्कद्युतिमप्रमे यम । 11-17
मुकुट । गदा और चक्र धारण किये । और अपनी तेजोराशि से । सम्पूर्ण दिशाओं को दीप्त करते हुये । हे भगवन ! आपको मैं । देखता हूँ । लेकिन आपका । निरीक्षण करना । अत्यन्त कठिन है । क्योंकि आप समस्त ओर से प्रकाशमयी । अप्रमेय ( जिसके समान कोई न हो ) तेजोमयी हैं ।
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे । 11-18
आप ही अक्षर ( जिसका कभी नाश नहीं होता ) हैं । आप ही परम हैं । आप ही जानना ज़रुरी है ( जिन्हें जाना जाना चाहिये )  आप ही इस विश्व के परम निधान ( आश्रय ) हैं । आप ही अव्यय ( विकार हीन ) हैं । मेरे मत में आप ही शाश्वत धर्म के रक्षक सनातन पुरुष हैं ।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदंतपन्तम । 11-19
आप आदि । मध्य । और अन्त रहित ( अनादिमध्यान्तम ) अनन्त वीर्य ( पराक्रम ) अनन्त बाहू ( बाजुयें ) हैं । चन्द्र ( शशि ) और सूर्य । आपके नेत्र हैं । हे भगवन ! मैं आपके अग्नि पूर्ण प्रज्वलित वक्त्रों ( मुँहों ) को देखता हूँ । जो अपने तेज से । इस विश्व को तपा ( गरमा ) रहे हैं ।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्टवादभुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन । 11-20
स्वर्ग ( आकाश ) और पृथ्वी के बीच में । जो भी स्थान है । सभी दिशाओं में । वह केवल 1 आपके द्वारा ही व्याप्त है ( स्वर्ग से लेकर पृथ्वी तक केवल आप ही हैं ) । आपके इस अद्भुत उग्र ( घोर ) रूप को देखकर । हे महात्मा ! तीनों लोक प्रव्यथित ( भय व्याकुल ) हो रहे हैं ।
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिदीभताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः । 11-21
आप ही में । देवता गण । प्रवेश कर रहे हैं । कुछ भयभीत हुये । हाथ जोड़े । आपकी स्तुति कर रहे हैं । महर्षि और सिद्ध गण स्वस्ति ( कल्याण हो ) उच्चारण कर । उत्तम स्तुतियों द्वारा । आपकी प्रशंसा कर रहे हैं ।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे । 11-22
रूद्र । आदित्य । वसु । साध्य गण । विश्वदेव । अश्विनी कुमार । मरूत गण । पितृ गण । गँधर्व । यक्ष । असुर । सिद्ध गण ।  सब आपको विस्मय से देखते हैं ।
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम । बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम । 11-23
हे महाबाहो ! बहुत से मुख । बहुत से नेत्र । बहुत सी भुजायें । बहुत सी जँघायें ( उरु ) पैर । बहुत से उदर ( पेट ) बहुत से विकराल दाँतो वाले । इस महान रूप को देखकर । यह संसार प्रव्यथित ( भयभीत ) हो रहा है ।  और मैं भी ।
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम । दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो । 11-24
आकाश को छूते । अनेकों प्रकार ( वर्णों ) वाले आपके दीप्तमान रूप । जिनके खुले हुये विशाल मुख हैं । और
प्रज्वलित ( दीप्तिमान ) विशाल नेत्र हैं । आपके इस रुप को देखकर । मेरी अन्तर आत्मा भयभीत ( प्रव्यथित ) हो रही है । न मुझे धैर्य मिल रहा हैं । हे विष्णु ! और न ही शान्ति ।
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्टवैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास । 11-25
आपके विकराल भयानक दाँतो को देखकर । और काल अग्नि के समान । भयानक प्रज्वलित मुखों को देखकर । मुझे दिशाओं की सुध नहीं रही । न ही मुझे । शान्ति प्राप्त हो रही है । प्रसन्न होईये । हे देवेश !( देवों के ईश ) हे जगन निवास !
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः । 11-26
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्त मा ङ्गैः । 11-27
धृतराष्ट्र के सभी पुत्र । और उनके साथ । और भी राजा लोग । भीष्म । द्रोण । तथा कर्ण । और हमारे पक्ष के भी । कई मुख्य योद्धा । आपके भयानक । विकराल दाँतों वाले । मुखों में प्रवेश कर रहे हैं । और आपके दाँतों के बीच फँसे । कईयों के सिर । चूर्ण हुये । दिखाई दे रहे हैं ।
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा दृवन्ति । तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्व लन्ति  । 11-28
जैसे अनेक नदियों के जल प्रवाह । वेग से । समुद्र में । प्रवेश करते हैं ( की ओर बढते हैं ) वैसे ही नर लोक ( मनुष्य लोक ) के । यह योद्धा । आपके प्रज्वलित मुखों में । प्रवेश करते हैं ।
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङगां विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्ध वेगाः । 11-29
जैसे जलती अग्नि में । पतंगे । बहुत तेज़ी से । अपने ही नाश के लिये । प्रवेश करते हैं । उसी प्रकार । अपने नाश के लिये । यह लोग । अति वेग से । आपके मुखों में । प्रवेश करते हैं ।
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलदिभः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो । 11-30
अपने प्रज्वलित मुखों से । इन संपूर्ण लोकों को निगलते हुये । और हर ओर से समेटते हुये । हे विष्णु ! आपका यह उग्र प्रकाश । संपूर्ण जगत में फैलकर । इन लोकों को तपा रहा है ।
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम । 11-31
इस उग्र रुप वाले । आप कौन हैं ? मुझसे कहिये । आपको प्रणाम है । हे देववर ! प्रसन्न होईये । हे आदिदेव ! मैं आपको । अनुभव सहित । जानना चाहता हूँ । मैं आपकी प्रवृत्ति । अर्थात इस रुप लेने के । कारण को । नहीं जानता ।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनी केषु योधाः । 11-32
श्रीकृष्ण बोले - मैं । संसार का क्षय । करने के लिये । प्रवृद्ध ( बढा ) हुआ । काल हूँ । और इस समय । इन लोकों का । संहार करने में । प्रवृत्त हूँ । तुम्हारे बिना भी । यहाँ तुम्हारे विपक्ष में । जो योद्धा गण स्थित हैं । वे भविष्य में नहीं रहेंगे ।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन । 11-33
इसलिये । तुम उठो । और । अपने शत्रुओं को जीतकर । यश प्राप्त करो । और समृद्ध राज्य भोगो । तुम्हारे यह शत्रु । मेरे द्वारा । पहले से ही मारे जा चुके हैं । हे सव्यसाचिन ! तुम केवल निमित्तमात्र ( कहने को ) ही बनो ।
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योद्धवीरान । मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान । 11-34
द्रोण । भीष्म । जयद्रथ । कर्ण । तथा अन्य वीर योद्धा भी । मेरे द्वारा ( पहले ही ) मारे जा चुके हैं । व्यथा ( गलत आग्रह ) त्यागो । और युद्ध करो । तुम रण में । अपने शत्रुओं को जीतोगे ।
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगदभदं भीतभीतः प्रणम्य । 11-35
संजय बोला - केशव के इन वचनों को सुनकर । मुकुटधारी अर्जुन ने । हाथ जोड़कर । श्रीकृष्ण को । नमस्कार किया । और काँपते हुये । भयभीत हृदय से । फिर से प्रणाम करते हुये बोले ।
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो दृवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः । 11-36
अर्जुन बोला - यह योग्य है । हे हृषीकेश ! कि यह जगत आपकी कीर्ति का गुणगान कर हर्षित होते हैं । और अनुरागित ( प्रेम युक्त ) होता है । आपसे भयभीत होकर । राक्षस । हर दिशाओं में भाग रहे हैं । और सभी सिद्ध गण । आपको नमस्कार कर रहे हैं ।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन गरीयसे बृह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत । 11-37
और हे महात्मा ! आपको नमस्कार । करें भी क्यों नहीं । आप ही । सबसे बढकर हैं । बृह्मा के भी । आदि कर्ता हैं ( बृह्मा के भी आदि हैं )। आप ही अनन्त हैं । देव ईश हैं । जगत निवास हैं । आप ही अक्षर हैं । आप ही सत और असत हैं । और उन संज्ञाओं से भी परे । जो हैं । वह भी आप ही हैं ।
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप । 11-38
आप ही । आदिदेव ( पुरातन देव ) हैं । सनातन पुरुष हैं । आप ही । इस संसार के परम आश्रय ( निधान ) हैं । आप ही । ज्ञाता हैं । और ज्ञेय ( जिन्हें जानना चाहिये ) हैं । आप ही । परम धाम हैं । और आपसे ही । यह संपूर्ण संसार व्याप्त है । हे अनन्त रुप !
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते । 11-39
आप ही । वायु हैं । आप ही । यम हैं । आप ही । अग्नि हैं । आप ही । वरुण ( जल देवता ) हैं । आप ही । चन्द्र हैं । प्रजापति भी । आप ही हैं । और प्रपितामह ( पितामह अर्थात पिता के पिता के भी पिता ) भी आप हैं । आपको नमस्कार है । नमस्कार है । सहस्र ( हज़ार ) बार मैं आपको नमस्कार करता हूँ । और फिर से । आपको नमस्कार है । नमस्कार है ।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः । 11-40
हे सर्व ! आपको । आगे से नमस्कार है । पीछे से भी । नमस्कार है । हर प्रकार से । नमस्कार है । हे अनन्त वीर्य ! हे अमित विक्रमशाली । सबमें आप समाये हुये हैं ( व्याप्त हैं )  आप ही । सब कुछ हैं ।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि । 11-41
हे भगवन ! आपको । केवल आपना मित्र ही मानकर । मैंने प्रमादवश ( मूर्खता कारण) या प्रेम वश । आपको । जो हे कृष्ण ! हे यादव ! हे सखा ! ( मित्र )  कहकर संबोधित किया । आपकी महिमा को न जानते हुये ।
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम । 11-42
और हास्य मज़ाक करते हुये । या चलते फिरते । लेटे हुये । बैठे हुये । अथवा भोजन करते हुये । अकेले में । या आपके सामने । मैंने जो भी । असत व्यवहार किया हो ( जितना आदर पूर्ण व्यहार करना चाहिये । उतना न किया हो ) उसके लिये । हे अप्रमेय ! आप मुझे । क्षमा कर दीजिये ।
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्र येऽप्यप्रति मप्रभाव । 11-43
आप । इस चर अचर लोक के । पिता हैं । आप ही । पूजनीय हैं । परम गुरू हैं । हे अप्रतिम प्रभाव ! इन तीनो लोकों में । आपके बराबर ( समान ) ही । कोई नहीं है । आपसे बढकर तो । कौन होगा भला ।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम । 11-44
इसलिये मैं । झुककर । आपको प्रणाम करता हूँ । मुझसे प्रसन्न होइये । हे ईश्वर ! जैसे 1 पिता अपने पुत्र के । मित्र आपने मित्र के । और प्रिय अपने प्रिय की । गलतियों को । क्षमा कर देता है । वैसे ही हे देव ! आप मुझे क्षमा कर दीजिये ।
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास । 11-45
जो मैंने पहले कभी नहीं देखा । आपके इस रुप को देख लेने पर । मैं अति प्रसन्न हो रहा हूँ । और साथ ही
साथ । मेरा मन भय से प्रव्यथित ( व्याकुल ) भी हो रहा है । हे भगवन ! आप कृपया कर मुझे अपना सौम्य देव रुप ( 4 बाहों वाला रुप ) ही दिखाईये । प्रसन्न होईये । हे देवेश ! हे जगन्निवास ! ( इस जगत के निवास स्थान ) ।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते । 11-46
मैं आपको मुकुट धारण किये । और हाथों में गदा । और चक्र धारण किये । देखने का इच्छुक हूँ । हे भगवन ! आप चतुर्भुज ( 4 भुजाओं वाला ) रुप धारण कर लीजिये । हे सहस्र बाहो ! ( हज़ारों बाहों वाले ) हे विश्व मूर्त ! ( विश्व रूप )।
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम । 11-47
श्रीकृष्ण बोले - हे अर्जुन ! तुम पर प्रसन्न होकर मैंने तुम्हे अपनी योगशक्ति द्वारा इस परम रूप का दर्शन कराया है । मेरे इस तेजोमयी । अनन्त । आदि विश्व रूप को तुमसे पहले किसी ने नहीं देखा है ।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके दृष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर । 11-48
हे कुरुप्रवीर ! ( कुरूओं में श्रेष्ठ वीर ) तुम्हारे अतिरिक्त इस नर लोक में कोई भी वेदों द्वारा । यज्ञों द्वारा । अध्ययन द्वारा । दान द्वारा । या क्रियाओं द्वारा ( योग क्रियाऐं आदि ) या फिर उग्र तप द्वारा भी । मेरे इस रुप को नहीं देख सकता ।
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य । 11-49
मेरे इस घोर रुप को देखकर । न तुम व्यथा करो । न मूढ भाव हो ( अतः भयभीत और स्तब्ध न हो )। तुम भयमुक्त होकर । फिर से प्रीति पूर्ण मन से ( प्रसन्न चित्त से ) मेरे इस ( सौम्य ) रूप को देखो ।
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा । 11-50
संजय बोला - अर्जुन को यह कहकर वासुदेव ने फिर से उन्हें अपने ( सौम्य ) रुप के दर्शन कराये । इस प्रकार उन महात्मा ( भगवान ) ने भयभीत हुये अर्जुन को अपना सौम्य रूप दिखाकर आश्वासन दिया ।
दृष्टवेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः । 11-51
अर्जुन बोला - हे जनार्दन ! आपके इस सौम्य ( मधुर ) मानुष रूप को देखकर शान्तचित्त होकर अपनी प्रकृति को प्राप्त हो गया हूँ ( अर्थात अब मेरी सुध बुध वापिस आ गई है )।
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङिक्षणः । 11-52
श्रीकृष्ण बोले - मेरा यह रूप जो तुमने देखा है । इसे देख पाना अत्यन्त कठिन ( अति दुर्लभ ) है । इसे देखने की देवता भी सदा कामना करते हैं ।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो दृष्टुं दृष्टवानसि मां यथा । 11-53
न मुझे वेदों द्वारा । न तप द्वारा । न दान द्वारा । और न ही यज्ञ द्वारा इस रूप मे देखा जा सकता है । जिस रूप में मुझे तुमने देखा है । हे अर्जुन ।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं दृष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप । 11-54
लेकिन अनन्य भक्ति द्वारा । हे अर्जुन ! मुझे इस प्रकार ( रूप को ) जाना भी जा सकता है । देखा भी जा सकता है । और मेरे तत्व ( सार ) में प्रवेश भी किया जा सकता है । हे परंतप !
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव । 11-55
जो मनुष्य । मेरे लिये ही । कर्म करता है । मेरी ही तरफ लगा हुआ है । मेरा भक्त है । और संग रहित है । ( दूसरी चीज़ों । विषयों के चिन्तन में । डूबा हुआ नहीं है ) सभी जीवों की तरफ वैर रहित है । वह भक्त मुझे प्राप्त करता है । हे पाण्डव !

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