रविवार, अगस्त 14, 2011

स्थिर प्रज्ञा वाले व्यक्ति को मृत्यु भी कैसे भयभीत कर सकती है ? अष्टावक्र गीता । अध्याय 3

अविनाशिनमात्मानं एकं विज्ञाय तत्त्वतः । तवात्मज्ञानस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः । 3-1
अष्टावक्र बोले - आत्मा को । अविनाशी और । 1 । जानो । उस आत्म ज्ञान को । प्राप्त कर । किसी बुद्धिमान व्यक्ति की । रूचि । धन अर्जित करने में । कैसे हो सकती है ।
आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभृमगोचरे । शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभृमे । 3-2
स्वयं के । अज्ञान से । भृमवश । विषयों से । लगाव हो जाता है । जैसे । सीप में । चाँदी का । भृम होने पर । उसमें । लोभ उत्पन्न । हो जाता है ।
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे । सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि । 3-3
सागर से । लहरों के समान । जिससे । यह विश्व । उत्पन्न होता है । वह - मैं ही हूँ । जानकर । तुम एक दीन  जैसे । कैसे भाग सकते हो ।
श्रुत्वापि शुद्धचैतन्य आत्मानमतिसुन्दरम । उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति । 3-4
यह सुनकर भी । कि आत्मा । शुद्ध । चैतन्य । और अत्यंत । सुन्दर है । तुम कैसे । जननेंद्रिय में । आसक्त होकर । मलिनता को । प्राप्त हो सकते हो ।
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते । 3-5
सभी प्राणियों में । स्वयँ को । और स्वयँ में । सब प्राणियों को । जानने वाले । मुनि में । ममता की । भावना का । बने रहना । आश्चर्य ही है ।
आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः । आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया । 3-6
एक बृह्म का । आश्रय लेने वाले । और मोक्ष के । अर्थ का । ज्ञान रखने वाले । का आमोद प्रमोद द्वारा । उत्पन्न । कामनाओं से । विचलित होना । आश्चर्य ही है ।
उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः । आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत कालमन्तमनुश्रितः । 3-7
अंत समय के । निकट पहुँच चुके । व्यक्ति का । उत्पन्न ज्ञान के । अमित्र काम की । इच्छा रखना । जिसको धारण करने में । वह अत्यंत अशक्त है । आश्चर्य ही है ।
इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः । आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका । 3-8
इस लोक । और परलोक से । विरक्त । नित्य । और अनित्य का । ज्ञान रखने वाले । और मोक्ष की । कामना । रखने वालों का । मोक्ष से डरना । आश्चर्य ही है ।
धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा । आत्मानं केवलं पश्यन् न तुष्यति न कुप्यति । 3-9
सदा । केवल आत्मा का । दर्शन करने वाले । बुद्धिमान व्यक्ति । भोजन कराने पर । या पीड़ित करने पर । न प्रसन्न होते हैं । और न क्रोध । ही करते हैं ।
चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत । संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः । 3-10
अपने कार्यशील । शरीर को । दूसरों के । शरीरों की । तरह । देखने वाले । महापुरुषों को । प्रशंसा । या निंदा । कैसे विचलित । कर सकती है ।
मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः । अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः । 3-11
समस्त जिज्ञासाओं से रहित । इस विश्व को । माया में । कल्पित देखने वाले । स्थिर प्रज्ञा वाले । व्यक्ति को । आसन्न मृत्यु भी । कैसे भयभीत कर सकती है ?
निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः । तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते । 3-12
निराशा में भी । समस्त इच्छाओं से रहित । स्वयं के ज्ञान से । प्रसन्न । महात्मा की तुलना । किससे की जा सकती है ?
स्वभावाद एव जानानो दृश्यमेतन्न किंचन । इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः । 3-13
स्वभाव से ही । विश्व को । दृश्यमान जानो । इसका । कुछ भी । अस्तित्व नहीं है । यह । गृहण करने । योग्य है । और यह । त्यागने योग्य । देखने वाला । स्थिर प्रज्ञायुक्त । व्यक्ति क्या देखता है ?
अंतस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः । यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये । 3-14
विषयों की । आतंरिक । आसक्ति का त्याग । करने वाले । संदेह से परे । बिना किसी इच्छा वाले । व्यक्ति को । स्वतः आने वाले । भोग । न दुखी कर सकते है । और न सुखी ।

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