रविवार, अगस्त 14, 2011

उस बृह्म को जानने वाले को पाप पुण्य नहीं लगता - अष्टावक्र गीता । अध्याय 4

हन्तात्मज्ञानस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया । न हि संसारवाही कैर्मूढैः सह समानता । 4-1
अष्टावक्र बोले - स्वयं को । जानने वाला । बुद्धिमान व्यक्ति । इस संसार की । परिस्थितियों को । खेल की तरह । लेता है । उसकी । सांसारिक परिस्थितियों का । बोझ ( दबाव ) लेने वाले । मोहित व्यक्ति । के साथ । बिलकुल भी । समानता नहीं है ।
यत पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः । अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति । 4-2
जिस पद की । इन्द्र आदि । सभी देवता । इच्छा रखते हैं । उस पद में । स्थित होकर भी । योगी । हर्ष नहीं । करता है ।
तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते । न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः । 4-3
उस ( बृह्म ) को । जानने वाले । के । अन्तःकरण से । पुण्य और पाप । का । स्पर्श नहीं । होता है । जिस प्रकार । आकाश में । दिखने वाले । धुयें से । आकाश का । संयोग नहीं । होता है ।
आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना । यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः । 4-4
जिस महापुरुष ने । स्वयँ को ही । इस समस्त । जगत के रूप में । जान लिया है । उसके स्वेच्छा से । वर्तमान में । रहने को । रोकने की । सामर्थ्य । किसमें है ?
आबृह्मस्तंबपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे । विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने । 4-5
बृह्मा से तृण तक । चारों प्रकार के । प्राणियों में । केवल आत्मज्ञानी ही । इच्छा और अनिच्छा का । परित्याग करने में । समर्थ है ।
आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम । यद वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित । 4-6
आत्मा को । एक और जगत का । ईश्वर । कोई कोई ही । जानता है । जो ऐसा । जान जाता है । उसको । किसी से भी । किसी प्रकार का । भय नहीं है ।

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