शनिवार, अगस्त 13, 2011

भगवान किसी के पाप को ग्रहण नहीं करते - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 5

संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम । 5-1
अर्जुन बोला - हे कृष्ण ! आप कर्मों के त्याग की प्रशंसा कर रहे हैं । और फिर योग द्वारा कर्मों को करने की भी । इन दोनों में से जो 1 मेरे लिये ज्यादा अच्छा है । वही आप निश्चित करके मुझे कहिये ।
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते । 5-2
श्रीकृष्ण बोले - संन्यास और कर्म योग । ये दोनों ही श्रेय हैं । परम की प्राप्ति कराने वाले हैं । लेकिन कर्मों से संन्यास की जगह । योग द्वारा । कर्मों का करना अच्छा है ।
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते । 5-3
उसे तुम । सदा संन्यासी ही जानो । जो न घृणा करता है । और न इच्छा करता है । हे महाबाहो ! द्वन्दता से मुक्त व्यक्ति । आसानी से ही । बंधन से मुक्त हो जाता है ।
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम । 5-4
संन्यास अथवा सांख्य को । और कर्म योग को । बालक ही भिन्न भिन्न देखते हैं । ज्ञानमंद नहीं । किसी भी 1 में ही स्थित मनुष्य । दोनों के ही फलों को । समान रूप से पाता है ।
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स: पश्यति । 5-5
सांख्य से । जो स्थान । प्राप्त होता है । वही स्थान । योग से भी । प्राप्त होता है । जो सांख्य और कर्म योग को । 1 ही देखता है । वही वास्तव में देखता है ।
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्बृह्म नचिरेणाधिगच्छति । 5-6
संन्यास अथवा त्याग । हे महाबाहो ! कर्म योग के बिना । प्राप्त करना कठिन है । लेकिन योग से युक्त मुनि । कुछ ही समय में बृह्म को प्राप्त कर लेते है ।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते । 5-7
योग से युक्त हुआ । शुद्ध आत्मा वाला । स्वयँ पर । और अपनी इन्द्रियों पर । जीत पाया हुआ । सभी जगह । और सभी जीवों में । 1 ही परमात्मा को देखता हुआ । ऐसा मुनि कर्म करते हुऐ भी लिपता नहीं है ।
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित । पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन । 5-8
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन । 5-9
सार को जानने वाला । यही मानता है । कि वो कुछ नहीं कर रहा । देखते हुये । सुनते हुये । छूते हुये । सूँघते हुये । खाते हुये । चलते फिरते हुये । सोते हुये । साँस लेते हुये । बोलते हुये । छोड़ते या पकड़े हुये । यहाँ तक कि आँखें खोलते । या बन्द करते हुये । अर्थात कुछ भी करते हुये । वो इसी भावना से युक्त रहता है  । कि वो कुछ नहीं कर रहा । वो यही धारण किये रहता है । कि इन्द्रियाँ अपने विषयों के साथ वरत रही हैं ।
बृह्मण्याधाय कर्माणि सङगं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पदमपत्रमिवाम्भसा । 5-10
कर्मों को बृह्म के हवाले कर । संग को त्याग कर । जो कार्य करता है । वो पाप में नहीं लिपता । जैसे कमल का पत्ता । पानी में भी । गीला नहीं होता ।
कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङगं त्यक्त्वात्मशुद्धये । 5-11
योगी । आत्मशुद्धि के लिये । केवल शरीर । मन । बुद्धि । और इन्द्रियों से । कर्म करते हैं । संग को त्याग कर ।
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते । 5-12
कर्म के फल का । त्याग करने की । भावना से युक्त होकर । योगी परम शान्ति पाता है । लेकिन जो । ऐसे युक्त नहीं हैं । इच्छा पूर्ति के लिये । कर्म के फल से । जुड़े होने के कारण । वो बँध जाता है ।
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन । 5 -13
सभी कर्मों को । मन से त्याग कर । देही इस 9 दरवाजों के देश । मतलब इस शरीर में । सुख से बसती है । न वो कुछ करती है । और न करवाती है ।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते । 5-14
प्रभु । न तो कर्ता होने की । भावना की । और न कर्म की । रचना करते हैं । न ही वे कर्म का फल से । संयोग कराते हैं । यह सब तो । स्वयँ के कारण ही । होता है ।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः । 5-15
न भगवान किसी के । पाप को ग्रहण करते हैं । और न किसी के । अच्छे कार्य को । ज्ञान को अज्ञान । ढक लेता है । इसलिये जीव । मोहित हो जाते हैं ।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम । 5-16
जिनके आत्म में स्थित । अज्ञान को । ज्ञान ने नष्ट कर दिया है । वह ज्ञान । सूर्य की तरह । सब प्रकाशित कर देता है ।
तदबुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः । 5-17
ज्ञान द्वारा । उनके सभी पाप धुले हुये । उसी ज्ञान में बुद्धि लगाये । उसी में आत्मा को लगाये । उसी में श्रद्धा रखते हुये । और उसी में डूबे हुये । वे ऐसा स्थान प्राप्त करते हैं । जिससे फिर लौटकर नहीं आते ।
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः । 5-18
ज्ञानमंद व्यक्ति । 1 विद्या विनय सम्पन्न । ब्राह्मण को । गाय को । हाथी को । कुत्ते को । और 1 नीच व्यक्ति को । इन सभी को । समान दृष्टि से देखता है ।
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं बृह्म तस्मादबृह्मणि ते स्थिताः । 5-19
जिनका मन । समता में स्थित है । वे यहीं इस जन्म में । मृत्यु को जीत लेते हैं । क्योंकि बृह्म । निर्दोष है । और समता पूर्ण है । इसलिये वे बृह्म में ही स्थित हैं ।
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम । स्थिरबुद्धिरसंमूढो बृह्मविदबृह्मणि स्थितः । 5-20
न प्रिय लगने वाला प्राप्त कर । वे प्रसन्न होते हैं । और न अप्रिय लगने वाला । प्राप्त करने पर । व्यथित होते हैं । स्थिर बुद्धि वाले । मूर्खता से परे । बृह्म को जानने वाले । ऐसे लोग बृह्म में ही स्थित हैं ।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत सुखम । स बृह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते । 5-21
बाहरी स्पर्शों से । न जुड़ी आत्मा । अपने आप में ही । सुख पाती है । ऐसी बृह्म योग से युक्त  आत्मा । कभी न अन्त होने वाले । निरन्तर सुख का । आनन्द लेती है ।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः । 5-22
बाहरी स्पर्श से उत्पन्न । भोग तो । दुख का ही घर हैं । शुरू और अन्त हो जाने वाले । ऐसे भोग । हे कौन्तेय ! उनमें बुद्धिमान लोग । रमा नहीं करते ।
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात । कामक्रोधोदभवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः । 5-23
यहाँ इस शरीर को त्यागने से पहले ही । जो काम और क्रोध से । उत्पन्न वेगों को । सहन कर पाने में । सफल हो पाये । ऐसा ( योग ) युक्त नर सुखी है ।
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी बृह्मनिर्वाणं बृह्मभूतोऽधिगच्छति । 5-24
जिसकी अन्तर आत्मा । सुखी है । अन्तर आत्मा में ही । जो तुष्ट है । और जिसका अन्तःकरण । प्रकाशमयी है । ऐसा योगी । बृह्म निर्वाण प्राप्त कर । बृह्म में ही । समा जाता है ।
लभन्ते बृह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः । 5-25
ॠषि । जिनके पाप । क्षीण हो चुके हैं । जिनकी द्वन्द्वता । छिन्न हो चुकी है । जो स्वयँ की ही तरह । सभी जीवों के हित में । रमे हैं । वो बृह्म निर्वाण प्राप्त करते हैं ।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम । अभितो बृह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम । 5-26
काम और क्रोध को त्यागे । साधना करते हुये । अपने चित को । नियमित किये । आत्मा का ज्ञान । जिन्हें हो चुका है । वे यहाँ होते हुये भी । बृह्म निर्वाण में ही स्थित हैं ।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ । 5 -27
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः । 5 -28
बाहरी स्पर्शों को । बाहर कर । अपनी दृष्टि को । अन्दर की ओर । भ्रुवों के मध्य में । लगाये । प्राण और अपान का । नासिकाओं में । 1 सा बहाव कर । इन्द्रियों । मन । और बुद्धि को । नियमित कर । ऐसा मुनि । जो मोक्ष प्राप्ति में ही । लगा हुआ है । इच्छा । भय । और क्रोध से मुक्त । वह सदा ही मुक्त है ।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति । 5-29
मुझे ही । सभी यज्ञों । और तपों का । भोक्ता । सभी लोकों का । महान ईश्वर । और सभी जीवों का । सुहृद जानकर । वह शान्ति को । प्राप्त करता है ।

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