शनिवार, अगस्त 13, 2011

मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 4

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽबृवीत । 4-1
श्रीकृष्ण बोले - इस अव्यय योग को । मैंने विवस्वान को बताया । विवस्वान ने इसे मनु को कहा । और मनु ने इसे इक्ष्वाक को बताया ।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप । 4-2
हे परन्तप ! इस तरह यह योग परम्परा से । राज ऋषियों को प्राप्त होता रहा । लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया । बहुत समय बाद । इसका ज्ञान नष्ट हो गया ।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम । 4-3
उसी पुरातन योग को । मैंने आज फिर तुम्हें बताया है । तुम मेरे भक्त हो । मेरे मित्र हो । और यह योग एक उत्तम रहस्य है ।
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति । 4-4
अर्जुन बोला - आपका जन्म तो अभी हुआ है । विवस्वान तो बहुत पहले हुऐ हैं । कैसे मैं यह समझूँ कि आपने इसे शुरू में बताया था ।
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप । 4-5
श्रीकृष्ण बोले - अर्जुन ! मेरे बहुत से जन्म बीत चुके हैं । और तुम्हारे भी । उन सबको मैं तो जानता हूँ । पर तुम नहीं जानते । हे परन्तप !
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया । 4-6
यद्यपि मैं अजन्मा । और अव्यय । सभी जीवों का महेश्वर हूँ । यद्यपि मैं । अपनी प्रकृति को । अपने वश में कर । अपनी माया से ही । संभव होता हूँ ।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम । 4-7
हे भारत ! जब जब धर्म का लोप होता है । और अधर्म बढता है । तब तब मैं स्वयँ की । रचना करता हूँ ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे । 4-8
सा्धु पुरुषों के कल्याण के लिये । और दुष्कर्मियों के विनाश के लिये । तथा धर्म की स्थापना के लिये । मैं युगों युगों में जन्म लेता हूँ ।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन । 4-9
मेरे जन्म और कर्म । दिव्य हैं । इसे जो सार वत जानता है । देह को त्यागने के बाद । उसका पुनर्जन्म नहीं होता । बल्कि वो मेरे पास आता है । हे अर्जुन !
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मदभावमागताः । 4-10
लगाव । भय और क्रोध से मुक्त । मुझमें ही मन को लगाये हुये । ( और सिर्फ़ एक ) मेरा ही आश्रय लिये लोग । ज्ञान और तप से पवित्र हो । मेरे पास पहुँचते हैं ।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः । 4-11
जो मेरे पास जैसे आता है । मैं उसे वैसे ही मिलता हूँ । हे पार्थ ! सभी मनुष्य हर प्रकार से मेरा ही अनुगमन करते हैं ।
काङक्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा । 4-12
जो किये काम में सफलता चाहते हैं । वो देवताओं का पूजन करते हैं । इस मनुष्य लोक में कर्मों से सफलता शीघ्र ही मिलती है ।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम । 4-13
ये चारों 4 वर्ण । मेरे द्वारा ही रचे गये थे । गुणों और कर्मों के विभागों के आधार पर । इन कर्मों का कर्ता होते हुऐ भी । परिवर्तन रहित मुझको । तुम अकर्ता ही जानो ।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते । 4-14
न मुझे । कर्म रंगते हैं । और न ही मुझमें । कर्मों के फलों के लिये । कोई इच्छा है । जो मुझे इस प्रकार जानता है । उसे कर्म नहीं बाँधते ।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वेरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मेव तस्मात्वं पूर्वेः पूर्वतरं कृतम । 4-15
पहले भी यह जानकर ही । मोक्ष की इच्छा रखने वाले । कर्म करते थे । इसलिये तुम भी कर्म करो । जैसे पूर्वों ने । पुरातन समय में किये ।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात । 4-16
कर्म क्या है ? और अकर्म क्या है ? विद्वान भी इसके बारे में मोहित हैं । तुम्हें मैं कर्म क्या है ? ये बताता हूँ । जिसे जानकर । तुम अशुभ से मुक्ति पा लोगे ।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः । 4-17
कर्म को । जानना जरूरी है । और न करने लायक । कर्म को भी । अकर्म को भी । जानना जरूरी है । क्योंकि कर्म । रहस्यमयी है ?
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत । 4-18
कर्म करने में । जो अकर्म देखता है । और कर्म न करने में भी । जो कर्म होता देखता है । वही मनुष्य बुद्धिमान है । और इसी बुद्धि से युक्त होकर । वो अपने सभी कर्म करता है ।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः । 4-19
जिसके द्वारा आरम्भ किया सब कुछ । इच्छा संकल्प से मुक्त होता है । जिसके सभी कर्म । ज्ञान रूपी अग्नि में । जलकर । राख हो गये हैं । उसे ज्ञानमंद लोग । बुद्धिमान कहते हैं ।
त्यक्त्वा कर्मफलासङगं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः । 4-20
कर्म के फल से । लगाव त्याग कर । सदा तृप्त । और आश्रयहीन रहने वाला । कर्म मे लगा हुआ होकर भी । कभी कुछ नहीं करता है ।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शरीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम । 4-21
मोघ आशाओं से मुक्त । अपने चित्त और आत्मा को । वश में कर । घर सम्पत्ति आदि । मानसिक परिग्रहों को त्याग । जो केवल । शरीर से कर्म करता है । वो कर्म करते हुये भी । पाप नहीं प्राप्त करता ।
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते । 4-22
स्वयँ ही चलकर आये । लाभ से ही सन्तुष्ट । द्वन्द्वता से ऊपर उठा हुआ । और दिमागी जलन से मुक्त । जो सफलता असफलता में । 1 सा है । वो कार्य करता हुआ भी । नहीं बँधता ।
गतसङगस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते । 4-23
संग छोड़ । जो । मुक्त हो चुका है । जिसका चित्त । ज्ञान में स्थित है । जो केवल । यज्ञ के लिये । कर्म कर रहा है । उसके सम्पूर्ण कर्म । पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं ।
बृह्मार्पणं बृह्म हविर्बृह्माग्नौ बृह्मणा हुतम । बृह्मैव तेन गन्तव्यं बृह्मकर्मसमाधिना  । 4-24
बृह्म ही । अर्पण करने का साधन है । बृह्म ही । जो अर्पण हो रहा है । वो है । बृह्म ही । वो अग्नि है । जिसमें अर्पण किया जा रहा है । और अर्पण करने वाला भी । बृह्म ही है । इस प्रकार कर्म करते समय । जो बृह्म में समाधित हैं । वे बृह्म को ही । प्राप्त करते हैं ।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । बृह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुहवति । 4-25
कुछ योगी । यज्ञ के द्वारा । देवों की पूजा करते हैं । और कुछ बृह्म की ही । अग्नि में । यज्ञ की आहुति देते हैं ।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुहवति । शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुहवति । 4-26
अन्य सुनने आदि इन्द्रियों की । संयम अग्नि में । आहुति देते हैं । और अन्य । शब्द आदि विषयों की । इन्द्रियों रूपी अग्नि में । आहूति देते हैं ।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुहवति ज्ञानदीपिते । 4-27
और दूसरे कोई । सभी इन्द्रियों और प्राणों को । कर्म में लगाकर । आत्म संयम द्वारा । ज्ञान से जल रही । योग अग्नि में अर्पित करते हैं ।
दृव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितवृताः । 4-28
इस प्रकार कोई । धन पदार्थों द्वारा । यज्ञ करते हैं । कोई तप द्वारा । यज्ञ करते हैं । कोई कर्म योग द्वारा । यज्ञ करते हैं । और कोई स्वाध्याय द्वारा । ज्ञान यज्ञ करते हैं । अपने अपने वृतों का । सावधानी से पालन करते हु्ये ।
अपाने जु्हवति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायाम परायणाः । 4-29
और भी कई अपान में । प्राण को अर्पित कर । और प्राण में । अपान को अर्पित कर । इस प्रकार प्राण और अपान की । गतियों को । नियमित कर । प्राणायाम में लगते हैं ।
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः । 4-30
अन्य कुछ । आहार न लेकर । प्राणों को प्राणों में । अर्पित करते हैं । ये सभी ही । यज्ञों द्वारा क्षीण पाप हुये । यज्ञ को जानने वाले हैं ।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम । 4-31
यज्ञ से उत्पन्न । इस अमृत का । जो पान करते हैं । अर्थात जो यज्ञ कर । पापों को क्षीण कर । उससे उत्पन्न शान्ति को प्राप्त करते हैं । वे सनातन बृह्म को । प्राप्त करते हैं । जो यज्ञ नहीं करता । उसके लिये यह लोक ही सुखमयी नहीं है । तो और कोई लोक भी । कैसे हो सकता है ? हे कुरुसत्तम !
एवं बहुविधा यज्ञा वितता बृह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे । 4-32
इस प्रकार बृह्म से । बहुत से यज्ञों का विधान हुआ । इन सभी को तुम । कर्म से उत्पन्न हुआ जानो । और ऐसा जान जाने पर । तुम भी कर्म से । मोक्ष पा जाओगे ।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते । 4-33
हे परन्तप ! धन आदि पदार्थों के यज्ञ से । ज्ञान यज्ञ । ज्यादा अच्छा है । सारे कर्म । पूर्ण रूप से । ज्ञान मिल जाने पर । अन्त पाते हैं ।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः । 4-34
सार को । जानने वाले । ज्ञानमंदों को । तुम प्रणाम करो । उनसे प्रश्न करो । और उनकी सेवा करो । वे तुम्हें । ज्ञान में । उपदेश देंगे ।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि । 4-35
हे पाण्डव ! उस ज्ञान में । जिसे जान लेने पर । तुम फिर से मोहित नहीं होगे । और अशेष सभी जीवों को । तुम अपने में । अन्यथा मुझमें देखोगे ।
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि । 4-36
यदि तुम । सभी पाप करने वालों से भी । अधिक पापी हो । तब भी । ज्ञान रूपी नाव द्वारा । तुम उन सब पापों को । पार कर जाओगे ।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा । 4-37
जैसे समृद्ध अग्नि । घास को भस्म कर डालती है । हे अर्जुन ! उसी प्रकार ज्ञान अग्नि । सभी कर्मों को । भस्म कर डालती है ।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति । 4-38
ज्ञान से अधिक पवित्र । इस संसार पर । और कुछ नहीं है । तुम स्वयँ ही । योग में सिद्ध हो जाने पर । समय के साथ । अपनी आत्मा में ज्ञान को प्राप्त करोगे ।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति । 4-39
श्रद्धा रखने वाले । अपनी इन्द्रियों का संयम कर । ज्ञान लभते हैं । और ज्ञान मिल जाने पर । जल्द ही परम शान्ति को प्राप्त होते हैं ।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः । 4-40
ज्ञानहीन और श्रद्धाही्न । शंकाओं मे डूबी आत्मा वालों का । विनाश हो जाता है । न उनके लिये ये लोक है । न कोई और । न ही शंका में डूबी हुयी आत्मा को । कोई सुख है ।
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । 4-41
योग द्वारा । कर्मों का त्याग किये हुआ । ज्ञान द्वारा शंकाओं को छिन्न भिन्न किया हुआ । आत्म मे स्थित व्यक्ति को कर्म नहीं बाँधते । हे धनंजय !
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत । 4-42
इसलिये । अज्ञान से जन्मे । इस संशय को । जो तुम्हारे हृदय मे घर किया हुआ है । ज्ञान रूपी तलवार से । चीर डालो । और योग को । धारण कर उठो । हे भारत !

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