शनिवार, अगस्त 13, 2011

ऐसे मनुष्यों को तुम निश्चय ही राक्षस जानो - श्रीमदभगवद गीता अध्याय - 17

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः । 17-1
अर्जुन बोले - हे कृष्ण ! जो लोग शास्त्र में बताई विधि की चिंता न कर । अपनी श्रद्धा अनुसार यजन ( यज्ञ ) करते हैं । उनकी निष्ठा कैसी है ? सात्विक । राजसिक । अथवा तामसिक ?
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु । 17-2
श्री भगवान बोले - हे अर्जुन ! देहधारियों की श्रद्धा उनके स्वभाव के अनुसार 3 प्रकार की होती है - सात्विक । राजसिक और तामसिक । इसके बारे में मुझसे सुनो ।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः । 17-3
हे भारत ! सबकी श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुसार ही होती है । जिस पुरुष की जैसी श्रद्धा होती है । वैसा ही वह स्वयँ भी होता है ।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः । प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः । 17-4
सात्विक जन देवताओं को यजते हैं । राजसिक लोग यक्ष औऱ राक्षसों का अनुसरण करते हैं । तथा तामसिक लोग भूत प्रेतों की यजना करते हैं ।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः । 17-5
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्धयासुरनिश्चयान । 17-6
जो लोग शास्त्रों में नहीं बताये घोर तप करते हैं । ऐसे दम्भ । अहंकार । काम । राग औऱ बल से चूर अज्ञानी ( बुद्धिहीन ) मनुष्य इस शरीर में स्थित 5 तत्वों को कर्षित करते हैं । साथ में मुझे भी जो उनके शरीर में स्थित हूँ । ऐसे मनुष्यों को तुम आसुरी निश्चय ( असुर वृ्त्ति ) वाले जानो ।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु । 17-7
प्राणियों को जो आहार प्रिय होता है । वह भी 3 प्रकार का होता है । वैसे ही यज्ञ । तप तथा दान सभी - ये सभी भी 3 प्रकार के होते हैं । इनका भेद तुम मुझसे सुनो ।
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः । 17-8
जो आहार आयु बढाने वाला । बल तथा तेज में वृद्धि करने वाला । आरोग्य प्रदान करने वाला । सुख तथा प्रीति बढाने वाला । रसमयी, स्निग्ध ( कोमल आदि )  हृदय की स्थिरता बढाने वाला होता है । ऐसा आहार सात्विक लोगों को प्रिय होता है ।
कटवम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः । 17-9
कटु ( कडवा )  खट्टा । ज्यादा नमकीन । अति तीक्ष्ण ( तीखा )  रूखा या कष्ट देने वाला । ऐसा आहार जो दुख । शोक और राग उत्पन्न करने वाला है । वह राजसिक मनुष्यों को भाता है ।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत । उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम । 17-10
जो आहार । आधा पका हो । रस रहित हो गया हो । बासा । दुर्गन्धित । गन्दा । या अपवित्र हो । वैसा तामसिक जनों को प्रिय लगता है ।
अफलाकाङिक्षभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः । 17-11
जो यज्ञ फल की कामना किये बिना । यज्ञ विधि अनुसार किया जाये । यज्ञ करना कर्तव्य है । मन में यह बिठा कर किया जाये वह सात्विक है ।
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम । 17-12
जो यज्ञ फल की कामना से । और दम्भ ( दिखावे आदि ) के लिये किया जाये । हे भारत श्रेष्ठ ! ऐसे यज्ञ को तुम राजसिक जानो ।
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम । श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते । 17-13
जो यज्ञ विधि हीन ढंग से किया जाये । अन्न दान रहित हो । मन्त्र हीन हो । जिसमें कोई दक्षिणा न हो । श्रद्धा रहित हो । ऐसे यज्ञ को तामसिक यज्ञ कहा जाता है ।
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम । बृह्मचर्यमहिंसा च शरीरं तप उच्यते । 17-14
देवताओं । ब्राह्मण । गुरु और बुद्धिमान ज्ञानी लोगों की पूजा । शौच ( सफाई । पवित्रता ) सरलता । बृह्मचर्य । अहिंसा - यह सब शरीर की तपस्या बताये जाते हैं ।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते । 17-15
उद्वेग न पहुँचाने वाले सत्य वाक्य । जो सुनने में प्रिय और हितकारी हों । ऐसे वाक्य बोलना । शास्त्रों का स्वाध्याय तथा अभ्यास । ये वाणी की तपस्या बताये जाते है ।
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते । 17-16
मन में शान्ति ( से उत्पन्न हुई प्रसन्नता ) सौम्यता । मौन । आत्म संयम । भावों ( अन्तःकरण ) की शुद्धि - ये सब मन की । तपस्या बताये जाते हैं ।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः । अफलाकाङिक्षभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते । 17-17
मनुष्य जिस श्रद्धा से तपस्या करता है । वह भी 3 प्रकार की है । सात्विक तपस्या वह है । जो फल की कामना से मुक्त होकर की जाती है ।
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत । क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम । 17-18
जो तपस्या सत्कार । मान तथा पूजे जाने के लिये की जाती है । या दिखावे । अथवा पाखण्ड से की जाती है । ऐसी अस्थिर और अध्रुव ( जिसका अस्तित्व स्थिर न हो ) तपस्या को राजसिक कहा जाता है ।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः । परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम  । 17-19
वह तप जो मूर्ख आगृह कारण ( गलत धारणा के कारण ) और स्वयं को पीडा पहुँचाने वाला । अथवा दूसरों को कष्ट पहुँचाने हेतु किया जाये । ऐसा तप तामसिक कहा जाता है ।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम । 17-20
जो दान यह मान कर दिया जाये कि - दान देना कर्तव्य है । न कि उपकार करने के लिये । और सही स्थान पर । सही समय पर उचित पात्र ( जिसे दान देना चाहिये ) को दिया जाये । उस दान को सात्विक दान कहा जाता है ।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम । 17-21
जो दान उपकार हेतु । या पुनः फल की कामना से दिया जाये । या कष्ट भरे मन से दिया जाये । उसे राजसिक कहा जाता है ।
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते । असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम । 17-22
परन्तु जो दान गलत स्थान पर । या गलत समय पर । अनुचित पात्र को दिया जाये । या बिना सत्कार अथवा तिरस्कार के दिया जाये । उसे तामसिक दान कहा जायेगा ।
ॐतत्सदिति निर्देशो बृह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा । 17-23
ॐ तत सत - इस प्रकार बृह्म का 3 प्रकार का निर्देश कहा गया है । उसी से पुरातन काल में ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञों का विधान हुआ है ।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं बृह्मवादिनाम । 17-24
इसलिये बृह्मवादी शास्त्रों में बताई विधि द्वारा सदा ॐ के उच्चारण द्वारा यज्ञ । दान । और तप क्रियायें आरम्भ करते हैं ।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङिक्षभिः । 17-25
और मोक्ष की कामना करने वाले मनुष्य " तत " कहकर फल की इच्छा त्याग कर यज्ञ, तप औऱ दान क्रियायें करते हैं । ( तत अर्थात - वह )
सदभावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते । 17-26
हे पार्थ ! सदभाव ( सत भाव ) तथा साधु भाव में सत शब्द का प्रयोग किया जाता है । उसी प्रकार प्रशंसनीय कार्य में भी " सत " शब्द प्रयुक्त होता है ।
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते । कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते । 17-27
यज्ञ । तप । तथा दान में स्थिर होने को भी सत कहा जाता है । तथा भगवान के लिये ही कर्म करने को भी " सत " कहा जाता है ।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत । असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह । 17-28
जो भी यज्ञ । दान । तपस्या या कार्य श्रद्धा बिना किया जाये । हे पार्थ ! उसे " असत " कहा जाता है । न उससे यहाँ कोई लाभ होता है । और न ही आगे ।

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