शनिवार, अगस्त 13, 2011

अपने काम में मृत्यु भी होना अच्छा है बजाय किसी और के काम से - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 3

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव । 3-1
अर्जुन बोला - हे केशव ! अगर आप । बुद्धि को । कर्म से अधिक । मानते हैं । तो मुझे इस घोर कर्म में क्यों न्योजित कर रहे हैं ?
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव में । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम । 3-2
मिले हुये से वाक्यों से । मेरी बुद्धि । शंकित हो रही है । इसलिये मुझे । वह 1 रास्ता बताईये । जो निश्चित प्रकार से । मेरे लिये अच्छा हो ।
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम । 3-3
श्रीकृष्ण बोले - हे नि़ष्पाप ! इस लोक में । मेरे द्वारा । 2 प्रकार की निष्ठायें । पहले बताई गयीं थीं । ज्ञान योग । सन्यास से जुङे लोगों के लिये । और कर्म योग । उनके लिये । जो कर्मयोग से जुड़े हैं ।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति । 3-4
कर्म का आरम्भ न करने से । मनुष्य नैष्कर्म सिद्धि । नहीं प्राप्त कर सकता । अतः कर्म योग के अभ्यास में । कर्मों का करना जरूरी है । और न ही केवल त्याग कर देने से । सिद्धि प्राप्त होती है ।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजेर्गुणेः । 3-5
कोई भी । एक क्षण के लिये भी । कर्म किये बिना । नहीं बैठ सकता । सब प्रकृति से पैदा हुये गुणों से । विवश होकर कर्म करते हैं ।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते । 3-6
कर्म की इन्द्रियों को तो रोककर । जो मन ही मन । विषयों के बारे में सोचता है । उसे मिथ्या अतः ढोंग आचारी कहा जाता है ।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते । 3-7

हे अर्जुन ! जो अपनी इन्द्रियों । और मन को । नियमित कर । कर्म का आरम्भ करते हैं । कर्म योग का आसरा लेते हुये । वह कहीं बेहतर हैं ।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः । 3-8
जो तुम्हारा काम है । उसे तुम करो । क्योंकि कर्म से ही । अकर्म पैदा होता है । मतलब कर्म योग द्वारा । कर्म करने से ही । कर्मों से छुटकारा मिलता है । कर्म किये बिना तो । यह शरीर की यात्रा भी संभव नहीं हो सकती । शरीर है । तो कर्म तो करना ही पड़ेगा ।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर । 3-9
केवल यज्ञ समझ कर । तुम कर्म करो । हे कौन्तेय ! वरना इस लोक में । कर्म बन्धन का कारण बनता है । उसी के लिये कर्म करते हुये । तुम संग से मुक्त रहकर । समता से रहो ।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक । 3-10
यज्ञ के साथ ही । बहुत पहले । प्रजापति ने । प्रजा की सृष्टि की । और कहा कि - इसी प्रकार कर्म यज्ञ करने से । तुम बढोगे । और इसी से । तुम्हारे मन की । कामनायें पूरी होंगी ।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ । 3-11
तुम देवताओं को प्रसन्न करो । और देवता तुम्हें प्रसन्न करेंगे । इस प्रकार परस्पर । एक दूसरे का खयाल रखते । तुम परम श्रेय को प्राप्त करोगे ।
इष्टान्भोगान्हि वह देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः । 3-12
यज्ञों से संतुष्ट हुये देवता । तुम्हें मन पसंद । भोग प्रदान करेंगे । जो उनके दिये हुये भोगों को । उन्हें दिये बिना । खुद ही भोगता है । वह चोर है ।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा यह पचन्त्यात्मकारणात । 3-13
जो यज्ञ से निकले । फल का आनंद लेते हैं । वह सब पापों से । मुक्त हो जाते हैं । लेकिन जो पापी । खुद पचाने के लिये ही । पकाते हैं । वे पाप के भागीदार बनते हैं ।
अन्नादभवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञादभवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुदभवः । 3-14
जीव अनाज से होते हैं । अनाज बारिश से होता है । और बारिश यज्ञ से होती है । यज्ञ कर्म से होता है ।
( यहाँ प्रकृति के चलने को यज्ञ कहा गया है )
 कर्म बृह्मोदभवं विद्धि बृह्माक्षरसमुदभवम । तस्मात्सर्वगतं बृह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम । 3-15
कर्म बृह्म से सम्भव होता है । और बृह्म अक्षर से होता है । इसलिये हर ओर स्थित बृह्म । सदा ही यज्ञ में स्थापित है ।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति । 3-16
इस तरह चल रहे । इस चक्र में । जो हिस्सा नहीं लेता । सहायक नहीं होता । अपनी इन्द्रियों में । डूबा हुआ वह । पाप जीवन जीने वाला । व्यर्थ ही । हे पार्थ ! जीता है ।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते । 3-17
लेकिन । जो मानव । खुद ही में स्थित है । अपने आप में ही । तृप्त है । अपने आप में ही । सन्तुष्ट है । उसके लिये । कोई भी । कार्य नहीं बचता ।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः । 3-18
न उसे कभी । किसी काम के । होने से । कोई मतलब है । और न ही । न होने से । और न ही । वह किसी भी । जीव पर । किसी भी । मतलब के लिये । आश्रय लेता है ।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः । 3-19
इसलिये कर्म से जुड़े बिना । सदा अपना कर्म करते हुये । समता का । आचरण करो । बिना जुड़े । कर्म का । आचरण करने से । पुरुष परम को । प्राप्त कर लेता है ।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि । 3-20
कर्म के । द्वारा ही । जनक आदि । सिद्धि में । स्थापित हुये थे । इस लोक समूह । इस संसार के । भले के लिये । तुम्हें भी । कर्म करना चाहिये ।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते । 3-21
क्योंकि । जो । 1  श्रेष्ठ पुरुष । करता है । दूसरे लोग भी । वही करते हैं । वह जो करता है । उसी को । प्रमाण मानकर । अन्य लोग भी । पीछे वही करते हैं ।
न में पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि । 3-22
हे पार्थ ! तीनों लोकों में । मेरे लिये । कुछ भी । करने वाला । नहीं है । और न ही । कुछ पाने वाला है । लेकिन फिर भी । मैं कर्म में लगता हूँ ।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः । 3-23
हे पार्थ ! अगर मैं । कर्म में । नहीं लगूँ । तो सभी । मनुष्य भी । मेरे पीछे । वही करने लगेंगे ।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः । 3-24
अगर मैं । कर्म न करूँ । तो इन लोकों में । तबाही मच जायेगी । और मैं । इस प्रजा का । नाशकर्ता हो जाऊँगा ।
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम । 3-25
जैसे अज्ञानी लोग । कर्मों से जुड़कर । कर्म करते हैं । वैसे ही । ज्ञानमन्दों को । चाहिये । कि कर्म से । बिना जुड़े । कर्म करें । इस संसार चक्र के । लाभ के लिये । ही कर्म करें ।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन । 3-26
जो लोग । कर्मो के । फलों से । जुड़े हैं । कर्मों से । जुड़े हैं । ज्ञानमंद । उनकी बुद्धि को । न छेदें । सभी कामों को । कर्मयोग बुद्धि से । युक्त होकर । समता का । आचरण करते हुये । करें ।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते । 3-27
सभी कर्म । प्रकृति में स्थित । गुणों द्वारा ही । किये जाते हैं । लेकिन । अहंकार से । विमूढ हुआ । मनुष्य । स्वयँ को ही । कर्ता समझता है ।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते । 3-28
हे महाबाहो ! गुणों और कर्मों के । विभागों को । सार तक । जानने वाला । यह मानकर । कि गुण ही गुणों से । वरत रहे हैं । जुड़ता नहीं ।
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत । 3-29
प्रकृति के गुणों से । मूर्ख हुये । गुणों के कारण हुये । उन कर्मों से । जुड़े रहते है । सब जानने वाले को । चाहिये । कि वह अधूरे ज्ञान वालों को । विचलित न करे ।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः । 3-30
सभी कर्मों को । मेरे हवाले कर । अध्यात्म में । मन को लगाओ । आशाओं से । मुक्त होकर । " मैं " को । भूलकर । बुखार मुक्त होकर । युद्ध करो ।
यह में मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः । 3-31
मेरे इस मत को । जो मानव । श्रद्धा । और बिना दोष निकाले । सदा धारण करता है । और मानता है । वह कर्मों से । मु्क्ति प्राप्त करता है ।
यह त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति में मतम । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः । 3-32
जो इसमें । दोष निकाल कर । मेरे इस मत का । पालन नहीं करता । उसे तुम । सारे ज्ञान से वंचित । मूर्ख हुआ । और नष्ट बुद्धि । जानो ।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति । 3-33
सब वैसा ही । करते हैं । जैसा उनका । स्वभाव होता है । चाहे वह । ज्ञानवान भी हो । अपने स्वभाव से ही । सभी प्राणी होते हैं । फिर सयंम से क्या होगा ?
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ । 3-34
इन्द्रियों के लिये । उनके विषयों में । खींच और घृणा । होती है । इन दोनों के । वश में । मत आओ । क्योंकि । यह रास्ते के रुकावट हैं ।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः । 3-35
अपना काम ही । अच्छा है । चाहे उसमें । कमियाँ भी हों । किसी और के । अच्छी तरह किये । काम से । अपने काम में । मृत्यु भी । होना अच्छा है । किसी और के । काम से । चाहे उसमें । डर न हो ।
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः । 3-36
अर्जुन बोला -  लेकिन । हे वार्ष्णेय ! किसके जोर में । दबकर पुरुष । पाप करता है । अपनी मरजी के । बिना भी । जैसे कि । बल से । उससे पाप । करवाया जा रहा हो ।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुदभवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम । 3-37
श्रीकृष्ण बोले - इच्छा । और गुस्सा । जो रज गुण से होते हैं । महा विनाशी । महापापी । इसे तुम । यहाँ । दुश्मन जानो ।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम । 3-38
जैसे आग को । धूआँ । ढक लेता है । शीशे को । मिट्टी । ढक लेती है । शिशु को । गर्भ । ढक लेता है । उसी तरह । वह इनसे । ढका रहता है । ( क्या ढका रहता है ? अगले श्लोक में )
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च । 3-39
यह ज्ञान को । ढकने वाला । ज्ञानमंद पुरुष का । सदा वैरी है । इच्छा का । रूप लिये । हे कौन्तेय ! जिसे । पूरा करना । संभव नहीं ।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम । 3-40
इन्द्रियाँ । मन । और बुद्धि । इसके स्थान । कहे जाते हैं । यह देहधारियों को । मूर्ख बना । उनके ज्ञान को । ढक लेती है ।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम । 3-41
इसलिये । हे भरतर्षभ ! सबसे पहले । तुम । अपनी इन्द्रियों को । नियमित करो । और इस । पापमयी । ज्ञान और विज्ञान का । नाश करने वाली । इच्छा का त्याग करो ।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः । 3-42
इन्द्रियों को । उत्तम । कहा जाता है । और इन्द्रियों से । उत्तम । मन है । मन से । ऊपर । बुद्धि है । और बुद्धि से । ऊपर । आत्मा है ।
एवं बुद्धेः परं बुदध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम । 3-43
इस प्रकार । स्वयँ को । बुद्धि से । ऊपर जानकर । स्वयँ को । स्वयँ के । वश में कर । हे महाबाहो ! इस इच्छा रूपी । शत्रु पर । जीत प्राप्त कर लो । जिसे जीतना । कठिन है ।

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